नई दिल्ली, 26 अक्टूबर (अशोक “अश्क”) सोने की लगातार बढ़ती कीमतों के बीच विज्ञान की दुनिया से आया एक दावा बाजार और वैज्ञानिक जगत, दोनों का ध्यान खींच रहा है। सैन फ्रांसिस्को की स्टार्टअप कंपनी मैराथन फ्यूजन ने न्यूक्लियर फ्यूजन तकनीक के जरिए पारे को शुद्ध सोने में बदलने में सफलता हासिल करने का दावा किया है। कंपनी के अनुसार, उसकी सोना उत्पादन दर 2025 में CERN द्वारा दर्ज किए गए बेंचमार्क से करीब 10 गुना अधिक है। हालांकि, इस दावे की अभी स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है। कंपनी के मुताबिक, इस प्रक्रिया में फ्यूजन प्रतिक्रिया के दौरान पैदा होने वाले उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रॉन का इस्तेमाल किया जाता है। इन न्यूट्रॉन को मरकरी-198 यानी पारे के एक आइसोटोप पर डाला जाता है। इससे मरकरी-197 बनता है, जो रेडियोधर्मी होता है और समय के साथ क्षय होकर स्थिर गोल्ड-197 में बदल जाता है।

वैज्ञानिक भाषा में इस प्रक्रिया को न्यूक्लियर ट्रांसम्यूटेशन कहा जाता है, जिसमें परमाणु के केंद्रक में बदलाव करके एक तत्व को दूसरे तत्व में बदला जाता है। इस दावे की तुलना CERN के प्रयोग से भी की जा रही है। 2015 से 2018 के बीच लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर में हुए प्रयोगों के दौरान वैज्ञानिकों ने बेहद मामूली मात्रा में सोना बनने का अध्ययन किया था। करीब 29 पिकोग्राम सोने के उत्पादन का यह आंकड़ा अत्यंत छोटा था। मैराथन फ्यूजन का दावा है कि उसकी तकनीक की उत्पादन दर इस बेंचमार्क से दस गुना ज्यादा है।हालांकि, अभी कई अहम सवाल अनुत्तरित हैं। कंपनी ने उत्पादित सोने की वास्तविक मात्रा, शुद्धता, रिकवरी दक्षता और प्रति ग्राम उत्पादन लागत का विस्तृत आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया है।

ऐसे में इसे व्यावसायिक सफलता मानना जल्दबाजी होगी।कंपनी ने भविष्य में एक फ्यूजन पावर प्लांट से सालाना करीब दो टन सोना बनाने का सैद्धांतिक अनुमान भी जताया है। यदि कभी यह तकनीक बड़े पैमाने पर व्यावहारिक और किफायती साबित हुई तो सोने की वैश्विक आपूर्ति बढ़ सकती है। इससे कीमतों पर दबाव पड़ने की संभावना जरूर बनेगी। फिलहाल, पारे से सोना बनाने का दावा जितना रोमांचक है, उतना ही वैज्ञानिक जांच और स्वतंत्र सत्यापन का मोहताज भी है।


















