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नेपाल में बालेन शाह के बयान से भूचाल: नेपाल ने भी भारतीय जमीन पर किया अतिक्रमण, संसद से सड़क तक मचा सियासी घमासन

नई दिल्ली, 01 जून (सेंट्रल डेस्क) नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के एक बयान ने देश की राजनीति में जबरदस्त हलचल पैदा कर दी है। संसद में सीमा विवाद पर चर्चा के दौरान शाह ने यह कहकर नया विवाद खड़ा कर दिया कि केवल भारत ने ही नेपाल की भूमि पर अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी कुछ स्थानों पर भारतीय क्षेत्र का उपयोग किया है। उनके इस बयान के बाद विपक्षी दलों, सीमा विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है, जबकि सरकार को सफाई देने के लिए आगे आना पड़ा है।

रविवार को नेपाली संसद में कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा सीमा विवाद पर पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें सीमा संबंधी कई तकनीकी जानकारियां मिली और उसी दौरान उन्हें यह भी पता चला कि सीमा के कुछ हिस्सों में नेपाल की ओर से भी भारतीय क्षेत्र का उपयोग किया जा रहा है। शाह के इस बयान के साथ ही संसद में हंगामा शुरू हो गया और विपक्षी सांसदों ने उनकी टिप्पणी को संसदीय रिकॉर्ड से हटाने की मांग कर डाली। नेपाल के प्रमुख अखबारों और राजनीतिक हलकों में इस बयान को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है।

सीमा मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि सीमा पार भूमि उपयोग और किसी दूसरे देश की भूमि पर आधिकारिक अतिक्रमण, दोनों अलग-अलग विषय हैं। पूर्व सर्वे महानिदेशक तोया बराल ने प्रधानमंत्री के दावे को खारिज करते हुए कहा कि नेपाल ने भारत की भूमि पर कोई अतिक्रमण नहीं किया है और प्रधानमंत्री का बयान तकनीकी रूप से सही नहीं माना जा सकता। विवाद उस समय और बढ़ गया जब यह जानकारी सामने आई कि नेपाल सरकार ने कालापानी विवाद के समाधान के लिए भारत और चीन के साथ-साथ ब्रिटेन से भी संपर्क साधने की कोशिश की है। नेपाल का तर्क है कि 1816 की सुगौली संधि और ब्रिटिश काल के पुराने नक्शों के आधार पर विवादित क्षेत्र नेपाल का हिस्सा है। हालांकि, नेपाल में ब्रिटेन के राजदूत रॉब फेन ने संकेत दिया है कि यह भारत और नेपाल के बीच का द्विपक्षीय मामला है और ब्रिटेन इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहता। बढ़ते विवाद के बीच नेपाल के विदेश मंत्रालय ने तत्काल सफाई जारी की। मंत्रालय ने कहा कि प्रधानमंत्री का बयान किसी आधिकारिक क्षेत्रीय दावे के संदर्भ में नहीं था, बल्कि सीमा के ‘दसगजा’ यानी नो-मैन्स-लैंड क्षेत्र में भूमि उपयोग और खेती-बाड़ी से जुड़ी तकनीकी वास्तविकताओं को लेकर था। मंत्रालय के अनुसार, कई स्थानों पर दोनों देशों के नागरिक सीमा पार स्थित जमीनों का उपयोग करते हैं, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा होती है। विपक्षी दलों ने सरकार की सफाई को अपर्याप्त बताया है। नेपाली कांग्रेस की सांसद बसना थापा ने प्रधानमंत्री से सार्वजनिक रूप से सबूत पेश करने की मांग की है। वहीं, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने बयान को राष्ट्रीय संप्रभुता के खिलाफ बताते हुए कहा कि इससे भारत के कथित विस्तारवाद को बल मिलता है।इस बीच, वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमिरे ने प्रधानमंत्री शाह से माफी मांगने की मांग की है। उनका कहना है कि इस तरह की टिप्पणी राष्ट्रीय हितों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर गलत संदेश देती है। हालांकि, सोशल मीडिया पर शाह के समर्थन में भी आवाजें उठ रही हैं। समर्थकों का कहना है कि प्रधानमंत्री ने टकराव की बजाय संवाद और कूटनीति का रास्ता अपनाने की बात कही है, जो परिपक्व नेतृत्व की पहचान है। ऐसे समय में जब नेपाल और भारत के बीच सीमा विवाद पहले से ही संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है और नेपाल के राजनीतिक नेतृत्व की भारत यात्रा भी प्रस्तावित है, बालेन शाह का यह बयान दोनों देशों के संबंधों और नेपाल की आंतरिक राजनीति में लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रह सकता है।

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