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कैसे तुझे हारा देखूं

आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में उत्तर प्रदेश, कौशाम्बी से सुप्रसिद्ध कवि विनोद कुमार जी की एक ग़ज़ल

मैं तेरा बाप हूँ कैसे तुझे हारा देखूं।

आज के बाद ये मंज़र न दुबारा देखूं।

इस नये दौर से बस इतनी गुज़ारिश है मेरी,

अपने बच्चों में बुढ़ापे का सहारा देखूं।

तेरी तस्वीर बसी है मेरी इन आँखों में,

तो भला क्यूँ मैं कोई और नज़ारा देखूं।

ख़ुद-ब-ख़ुद नाम जुबां पर तेरा आ जाता है,

आसमां में कोई जब टूटता तारा देखूं।

घर में आते ही बहू, क्यूँ मेरे बेटे मैं तुझे,

हाथ से जैसे फिसलता हुआ पारा देखूं।

मुफ़लिसों को भी मिले न्याय अमीरों कि तरह

है तमन्ना कोई ऐसा भी इदारा देखूं।

चार बच्चों का मुझे बाप न कहिये यारों,

कुछ करो यूँ कि मैं भी ख़ुद को कुँवारा देखूं।

~ विनोद कुमार

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