पटना, 23 अक्टूबर (पटना डेस्क) कोसी क्षेत्र की जलमग्न और दलदली जमीनें मखाना उत्पादन के लिए वरदान साबित हो सकती हैं, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के कारण यह प्राकृतिक संपदा किसानों के लिए अब तक पूरी तरह उपयोगी नहीं बन सकी है। सरायगढ़-भपटियाही प्रखंड में पूर्वी कोसी तटबंध से सटे गाइड बांध और एनएच के बीच सैकड़ों एकड़ जमीन वर्षभर पानी में डूबी रहती है। मखाना खेती के लिए अनुकूल इन खेतों में बड़े पैमाने पर उत्पादन की संभावना के बावजूद सरकारी स्तर पर ठोस पहल नहीं हो रही है। कृषि जानकारों के अनुसार मखाना की खेती के लिए स्थायी जलयुक्त और दलदली भूमि सबसे उपयुक्त मानी जाती है। इस लिहाज से यह पूरा इलाका प्राकृतिक रूप से बेहद अनुकूल है।

बावजूद इसके किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और प्रोत्साहन नहीं मिलने से खेती का दायरा लगातार सिमट रहा है। कभी यहां करीब 200 से 250 एकड़ में मखाना की खेती होती थी, लेकिन अब यह घटकर लगभग 100 एकड़ के आसपास रह गई है। स्थानीय युवाओं का कहना है कि यदि सरकार मखाना उत्पादन को संस्थागत सहयोग दे तो क्षेत्र में रोजगार के नए द्वार खुल सकते हैं। वर्तमान में रोजगार के लिए बड़ी संख्या में मजदूर पंजाब, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों में पलायन करते हैं। मखाना खेती का विस्तार होने पर हजारों लोगों को स्थानीय स्तर पर काम मिल सकता है। किसान महेंद्र यादव ने बताया कि उचित सरकारी सहयोग मिलने पर पुरानी स्थिति बहाल की जा सकती है।

मखाना को पोषक तत्वों से भरपूर ‘सुपर फूड’ माना जाता है। बाजार में कच्चा मखाना करीब 200 से 250 रुपये किलो, जबकि इसका लावा 500 से 600 रुपये किलो तक बिकता है। इसके बावजूद क्षेत्र में मखाना से लावा तैयार करने का काम लगभग बंद है। किसान कच्चा उत्पाद बेचने को मजबूर हैं। यदि यहां प्रोसेसिंग यूनिट और पैकेजिंग सेंटर स्थापित किए जाएं तो किसानों की आय कई गुना बढ़ सकती है। साथ ही स्थानीय युवाओं और महिलाओं के लिए स्वरोजगार के अवसर पैदा होंगे। इससे मखाना उत्पादन के साथ-साथ कोसी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को भी नई रफ्तार मिल सकती है।

















