बक्सर, 30 अक्टूबर (विक्रांत) बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की गई है। विश्वविद्यालय की 32वीं अनुसंधान परिषद (रबी 2026-27) की दो दिवसीय बैठक का शुक्रवार को समापन हुआ। इस दौरान चना की उन्नत किस्म ‘सबौर चना-4’ का सदन से विमोचन किया गया। खास बात यह है कि इस किस्म की खेती में यांत्रिक कटाई की सुविधा के कारण श्रम और लागत में लगभग 22 प्रतिशत तक बचत हो सकती है। बैठक के दूसरे दिन पांच अनुसंधान समूहों के अंतर्गत 100 शोध प्रस्तुतियों पर व्यापक वैज्ञानिक मंथन हुआ। नई किस्म ‘सबौर चना-4’ देसी प्रकार की सीधी और छोटे दाने वाली किस्म है। यह लगभग 122 दिनों में पककर तैयार हो जाती है।

इसकी पौध संरचना मशीन से कटाई के अनुकूल विकसित की गई है। इसकी औसत उपज क्षमता 18 से 19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई गई है। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि बिहार में चना उत्पादन को अधिक लाभकारी बनाने और कृषि के यंत्रीकरण को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। बैठक में फसल सुधार एवं कृषि जैव प्रौद्योगिकी, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, फसल सुरक्षा, सामाजिक विज्ञान तथा उत्पाद विकास एवं विपणन समूहों के तहत शोध प्रस्तुत किए गए। गेहूं, मक्का, चना, मसूर, मटर, मूंग, अलसी, सरसों, तिल और विभिन्न सब्जियों की उन्नत किस्मों, गुणवत्ता एवं रोग प्रतिरोधकता पर चर्चा हुई। चना में फ्यूजेरियम विल्ट प्रतिरोध, अलसी में विल्ट प्रतिरोध और केले में पनामा विल्ट से जुड़े शोध भी प्रस्तुत किए गए।

प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के तहत रबी मक्का में कैनोपी सेंसर आधारित नाइट्रोजन प्रबंधन, बेबी कॉर्न में सल्फर एवं जिंक का उपयोग, सहफसली खेती तथा पूर्णिया क्षेत्र की मिट्टी और भूजल में आर्सेनिक एवं आयरन की स्थिति पर विचार हुआ। आम, लीची, पपीता, ड्रैगन फ्रूट और स्ट्रॉबेरी के उत्पादन से जुड़े अनुसंधान भी सामने आए।फसल सुरक्षा समूह में कीट एवं रोग नियंत्रण, कीटनाशक प्रतिरोधकता, आम में मिलीबग, अमरूद में स्टाइलर एंड रॉट और मसूर में समेकित कीट प्रबंधन पर चर्चा हुई। सामाजिक विज्ञान समूह में मधुमक्खी पालन, कृषि शिक्षा की गुणवत्ता और प्याज की आपूर्ति श्रृंखला जैसे विषय शामिल रहे। उत्पाद विकास समूह में मशरूम पाउडर, फूलों के प्रसंस्करण और सोया दूध से फल-स्वादयुक्त दही तैयार करने के नवाचार प्रस्तुत किए गए।

कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने कहा कि अनुसंधान परिषद की बैठकों को अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनाया जाएगा। इसके लिए प्रस्तुतियों का एक समान प्रारूप और प्रत्येक प्रस्तुतकर्ता के लिए निश्चित समय-सीमा निर्धारित करने का निर्देश दिया। उन्होंने अनुसंधान कार्यक्रमों में विभिन्न विषयों के वैज्ञानिकों की सहभागिता सुनिश्चित करने तथा नई किस्मों के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए बड़े स्तर पर प्रदर्शन आयोजित करने पर जोर दिया। विशेषज्ञ डॉ. देवेंद्र सिंह ने कहा कि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित तकनीकों को कृषि विज्ञान केंद्रों और प्रसार कार्यकर्ताओं के माध्यम से किसानों तक पहुंचाना जरूरी है। अनुसंधान की वास्तविक सफलता तभी है, जब किसान खेतों में तकनीक अपनाकर लाभ प्राप्त करें। उन्होंने वैज्ञानिकों को उत्साह और समर्पण के साथ काम करने का संदेश दिया। विशेषज्ञ डॉ. ए. पी. सिंह ने समेकित कृषि प्रणाली, जैविक खेती, संतुलित उर्वरक उपयोग, फसल विविधीकरण, मखाना प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। डीन पोस्ट ग्रेजुएट स्टडीज डॉ. जे. एन. श्रीवास्तव ने वैज्ञानिकों को सीड मनी परियोजनाओं के माध्यम से अनुसंधान शुरू करने का अवसर उपलब्ध कराने को महत्वपूर्ण पहल बताया। बैठक में प्रगतिशील किसान श्रीमती स्वीटी कुमारी, रामानंद प्रसाद सिंह और योगेंद्र मंडल ने भी अपने अनुभव साझा किए। किसानों ने बाढ़, बालू जमाव, मृदा स्वास्थ्य और फसल विविधीकरण से जुड़ी चुनौतियों पर वैज्ञानिकों का ध्यान आकृष्ट कराया। बैठक में दलहन एवं गुणवत्तायुक्त बीज उत्पादन, टिकाऊ कृषि पद्धतियों और चयनित गांवों में सामुदायिक मॉडल के रूप में कार्बन फार्मिंग शुरू करने की संस्तुति की गई। समापन सत्र में डिप्टी डायरेक्टर रिसर्च डॉ. शैल्बाला डे ने धन्यवाद ज्ञापन किया। बैठक में प्राप्त सुझावों को विश्वविद्यालय की आगामी अनुसंधान योजनाओं में शामिल करने पर सहमति बनी।


















