पटना, 14 अप्रैल (अविनाश कुमार) बिहार की राजनीति में ऐतिहासिक मोड़ आ गया है। दशकों तक सहयोगी दल की भूमिका निभाने वाली भारतीय जनता पार्टी ने अब सत्ता की कमान सीधे अपने हाथ में ले ली है। तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए सम्राट चौधरी को भाजपा विधायक दल का नेता चुना गया, जिसके बाद एनडीए की संयुक्त बैठक में उनके नाम पर अंतिम मुहर लग गई।

सबसे भावुक क्षण तब देखने को मिला जब सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और नीतीश ने उन्हें माला पहनाकर नेतृत्व सौंपा। यह तस्वीर सियासी गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गई है। भाजपा विधायक दल की बैठक में डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा ने सम्राट के नाम का प्रस्ताव रखा, जिसे बाद में एनडीए बैठक में खुद नीतीश कुमार ने आगे बढ़ाया।

सभी विधायकों ने जोरदार समर्थन के साथ इस प्रस्ताव को पारित किया। अब सम्राट चौधरी राज्यपाल सैयद अता हसनैन के समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे। 15 अप्रैल को शपथ ग्रहण समारोह प्रस्तावित है। सम्राट चौधरी का सियासी सफर भी कम दिलचस्प नहीं रहा। मूल रूप से राकेश कुमार नाम के साथ राजनीति में आए सम्राट ने अपने करियर की शुरुआत राष्ट्रीय जनता दल से की थी। महज 31 वर्ष की उम्र में वे कृषि मंत्री बने और राज्य के सबसे युवा मंत्रियों में शामिल हुए।

बाद में उन्होंने लालू प्रसाद यादव का साथ छोड़ नीतीश कुमार के साथ कदम मिलाया, लेकिन वैचारिक मतभेदों के चलते 2017 में भाजपा का दामन थाम लिया। इसके बाद उनका राजनीतिक कद तेजी से बढ़ता गया। मार्च 2023 में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने संगठन को मजबूत किया और अब पहली बार बिहार में भाजपा के मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रचने जा रहे हैं।बिहार की सियासत में यह बदलाव केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरणों में बड़े बदलाव का संकेत भी माना जा रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बिहार किस दिशा में आगे बढ़ता है।















