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जलवायु संकट से निपटने को बीएयू का बड़ा एक्शन प्लान: 14 अनुसंधान केंद्रों की समीक्षा, किसानों के लिए बनेगी नई रणनीति

बक्सर, 30 मई (विक्रांत) बदलते जलवायु परिदृश्य और कृषि क्षेत्र के सामने खड़ी नई चुनौतियों के बीच बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर ने राज्यभर में संचालित अपने सभी 14 क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्रों की व्यापक समीक्षा कर कृषि अनुसंधान और प्रौद्योगिकी विकास की नई दिशा तय करने की पहल की है। विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशालय की ओर से आयोजित उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने की।बैठक में 50 से अधिक वैज्ञानिकों और केंद्र प्रभारियों ने भाग लिया तथा अपने-अपने क्षेत्रों में चल रहे अनुसंधान कार्यक्रमों, तकनीकी विकास, बीज उत्पादन, प्रसार गतिविधियों, आधारभूत संरचना निर्माण और भविष्य की कार्ययोजनाओं का विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत किया।

समीक्षा के दौरान कृषि-जलवायु क्षेत्रों की जरूरतों के अनुरूप क्षेत्र-विशिष्ट, मांग-आधारित और जलवायु-स्मार्ट कृषि अनुसंधान को प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया। वैज्ञानिकों को उच्च उत्पादकता वाली तथा जैविक और अजैविक तनावों को सहन करने वाली नई फसल किस्मों के विकास, बहु-स्थलीय परीक्षणों और किसान सहभागिता आधारित तकनीकी सत्यापन कार्यक्रमों को गति देने के निर्देश दिए गए। साथ ही विभिन्न अनुसंधान केंद्रों के बीच नेटवर्क आधारित परियोजनाओं को बढ़ावा देने और उपलब्ध वैज्ञानिक संसाधनों के बेहतर उपयोग पर भी बल दिया गया।

बैठक में प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (PMDDKY) के तहत जिला-विशिष्ट कृषि रणनीतियों, कृषि आकस्मिकता योजनाओं, जलवायु जोखिम प्रबंधन तथा साक्ष्य-आधारित नीति दस्तावेजों के निर्माण पर भी विस्तार से चर्चा हुई। जीआई-टैग प्राप्त उत्पादों पर आधारित कृषि प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और कृषि उद्यमिता को बढ़ावा देकर किसानों की आय बढ़ाने के उपायों पर विचार-विमर्श किया गया। कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने कहा कि क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र किसानों की वास्तविक समस्याओं का समाधान खोजने वाली अग्रिम पंक्ति की संस्थाएं हैं। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है और ऐसे समय में जलवायु-स्मार्ट, संसाधन-संरक्षण आधारित तथा किसान-केंद्रित तकनीकों का विकास बेहद जरूरी है। बैठक में गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन, डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से अनुसंधान उपलब्धियों के प्रचार-प्रसार, किसानों तक वैज्ञानिक अनुशंसाओं की त्वरित पहुंच और हालिया आंधी-तूफान एवं अतिवृष्टि से हुई फसल क्षति के वैज्ञानिक आकलन पर भी विशेष चर्चा हुई। अंत में उप निदेशक (अनुसंधान) डॉ. शैलबाला दई ने सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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