पटना, 05 अप्रैल (अविनाश कुमार) बिहार में आर्थिक प्रबंधन को लेकर बड़ा संकट खड़ा हो गया है। करीब 10 लाख कर्मचारियों और पेंशनर्स के वेतन-पेंशन भुगतान में देरी ने सरकार को कटघरे में ला खड़ा किया है। नीतीश कुमार की अगुवाई वाली सरकार जहां इसे अस्थायी समस्या बता रही है, वहीं विपक्ष इसे “आर्थिक कुप्रबंधन” करार दे रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, फंड की कमी के चलते कई विभागों में भुगतान अटक गया है। ग्रामीण कार्य, सड़क निर्माण और जन स्वास्थ्य अभियंत्रण जैसी परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं।

ठेकेदारों का कहना है कि उन्हें भुगतान के लिए इंतजार करने को कहा जा रहा है, जिससे काम ठप होने की कगार पर है। केवल सड़क और ग्रामीण कार्य विभागों पर ही करीब 15,000 करोड़ रुपये का बकाया बताया जा रहा है। राष्ट्रीय जनता दल के प्रवक्ता चितरंजन गगण ने सरकार पर “अति-लोकलुभावनवाद” का आरोप लगाते हुए कहा कि सीमित राजस्व के बावजूद 50,000 करोड़ रुपये से अधिक की योजनाएं लागू करना “नीतिगत पंगुता” को दर्शाता है। वहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने इसे विरोधाभासी स्थिति बताया।

उन्होंने कहा कि एक ओर “समृद्धि यात्रा” की बात होती है, दूसरी ओर राज्य खाली खजाने की समस्या झेल रहा है। सरकार की ओर से जनता दल (यूनाइटेड) के प्रवक्ता नीरज कुमार ने सफाई दी कि फंड की कमी अस्थायी है और राज्य ने आवंटित बजट का पूरा उपयोग किया है। उन्होंने कहा कि सामाजिक कल्याण योजनाएं सरकार की प्राथमिकता हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, बिहार का लगभग 45% बजट वेतन, पेंशन और कर्ज ब्याज में खर्च हो जाता है, जबकि 74% राजस्व केंद्र पर निर्भर है। ऐसे में फंड का संतुलन बिगड़ते ही संकट गहरा जाता है। फिलहाल, जनता की नजर इस पर टिकी है कि सरकार इस वित्तीय दबाव से कैसे उबरती है।
















