पटना, 14 अप्रैल (अविनाश कुमार) बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव सामने आया है। मुख्यमंत्री पद से नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद अब सबसे बड़ा सवाल उनके कार्यकाल में शुरू हुई विशाल योजनाओं के भविष्य को लेकर खड़ा हो गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में इस समय विभिन्न विभागों की करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाएं प्रगति पर हैं, जिनका भविष्य अब नई सरकार के फैसलों पर निर्भर करेगा।

नई सरकार के संभावित नेतृत्व के तौर पर सम्राट चौधरी का नाम चर्चा में है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अधूरी परियोजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करना होगी। खासकर सड़क और पुल निर्माण से जुड़ी कई महत्वपूर्ण योजनाएं अभी अधूरी हैं, जो राज्य के बुनियादी ढांचे के लिए बेहद जरूरी मानी जा रही हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र में भी स्थिति कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। नीतीश सरकार ने लगभग 20 नए मेडिकल कॉलेज और अस्पताल खोलने की योजना बनाई थी, लेकिन कई परियोजनाएं अभी शुरुआती चरण में ही अटकी हुई है।

वहीं सरकारी अस्पतालों में 30 से 35 प्रतिशत पद खाली हैं, जिससे स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं। शिक्षा व्यवस्था भी बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है। सरकारी स्कूलों में करीब एक लाख शिक्षकों के पद खाली हैं, जबकि विश्वविद्यालयों में भी 40 प्रतिशत तक पद रिक्त हैं। ऐसे में नई सरकार को नियुक्ति प्रक्रिया तेज करनी होगी, साथ ही जर्जर स्कूल भवनों और बुनियादी सुविधाओं को सुधारना भी जरूरी होगा।रोजगार के मोर्चे पर भी नई सरकार की परीक्षा होगी।

नीतीश कुमार ने 10 लाख नौकरियां देने का वादा किया था, जिसे पूरा करना आसान नहीं होगा। इसके अलावा औद्योगिक निवेश के करीब 50 हजार करोड़ रुपये के प्रस्ताव अब तक पूरी तरह धरातल पर नहीं उतर पाए हैं। ऐसे में साफ है कि नई सरकार के सामने सिर्फ सत्ता संभालने का ही नहीं, बल्कि विकास की अधूरी कहानी को पूरा करने का भी बड़ा इम्तिहान होगा।

















