पटना, 11 अप्रैल (अविनाश कुमार) बिहार की राजनीति में उस वक्त हलचल और तेज हो गई जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा की सदस्यता ग्रहण की। इसके साथ ही राज्य में संभावित ‘सत्ता हस्तांतरण’ की प्रक्रिया ने रफ्तार पकड़ ली है। दिल्ली से लेकर पटना तक लगातार बैठकों का दौर जारी है, लेकिन अंदरखाने जदयू और बीजेपी के बीच मतभेद उभरकर सामने आ रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक, नई सरकार के गठन से पहले जदयू ने बीजेपी के सामने कई अहम शर्तें रख दी हैं। इनमें गृह मंत्रालय, दो उपमुख्यमंत्री पद और बिहार विधानसभा अध्यक्ष पद की मांग प्रमुख है। जदयू का मानना है कि विधानसभा अध्यक्ष का पद उनके पास रहने से किसी भी संभावित राजनीतिक संकट में उनकी स्थिति मजबूत बनी रहेगी। यही कारण है कि पार्टी इस पद को लेकर कोई समझौता करने के मूड में नहीं दिख रही है।

इस बीच, हरिवंश नारायण सिंह को राज्यसभा भेजे जाने के फैसले ने विवाद को और गहरा कर दिया है। जदयू नेतृत्व इस निर्णय से खासा नाराज बताया जा रहा है। पार्टी का आरोप है कि बीजेपी ने इस मुद्दे पर उनसे कोई चर्चा नहीं की और एकतरफा फैसला लिया। जदयू नेताओं का कहना है कि हरिवंश पार्टी की कई महत्वपूर्ण बैठकों से अनुपस्थित रहे थे और उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी से भी बाहर किया जा चुका था।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिस नेता को जदयू ने किनारे कर दिया, उसे बीजेपी ने राज्यसभा भेजकर क्या संदेश देने की कोशिश की है। पार्टी के अंदर इसे “राजनीतिक संकेत” के तौर पर देखा जा रहा है, जिससे गठबंधन में असहजता बढ़ी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों दलों के बीच जल्द सहमति नहीं बनी, तो बिहार में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया और जटिल हो सकती है। फिलहाल, सबकी निगाहें दिल्ली और पटना में चल रही बैठकों पर टिकी हैं, जहां आने वाले दिनों में बड़ा फैसला संभव है।














