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4 अरब डॉलर की यूरेनियम डील से बदलेगा ऊर्जा संतुलन का खेल, भारत-कजाकिस्तान समझौते ने वैश्विक ऊर्जा संतुलन हिला दिया

नई दिल्ली, 28 अप्रैल (अशोक “अश्क”) ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर भारत ने एक बड़ा रणनीतिक दांव खेल दिया है। कजाकिस्तान के साथ करीब 4 अरब अमेरिकी डॉलर की ऐतिहासिक यूरेनियम डील ने न सिर्फ भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता को नई ताकत दी है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संतुलन में भी हलचल मचा दी है। यह समझौता कजाकिस्तान की राष्ट्रीय यूरेनियम कंपनी Kazatomprom के साथ हुआ है, जिसके शेयरधारकों ने 92.9 प्रतिशत समर्थन देकर इस सौदे को मंजूरी दी। विशेषज्ञ इसे एशिया की सबसे बड़ी यूरेनियम आपूर्ति व्यवस्थाओं में से एक और इस दशक की सबसे अहम परमाणु ईंधन साझेदारी मान रहे हैं।

इस डील के तहत भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग के खरीद एवं भंडार निदेशालय को प्राकृतिक यूरेनियम सांद्रण (U₃O₈) की दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। इसका सीधा फायदा भारत के परमाणु रिएक्टरों को मिलेगा, जिन्हें अब कई वर्षों तक स्थिर ईंधन उपलब्ध रहेगा। भारत के लिए यह समझौता सिर्फ ईंधन खरीद नहीं, बल्कि भविष्य की ऊर्जा रणनीति का मजबूत आधार है। देश ने 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा है। ऐसे में यह डील बढ़ती बिजली मांग और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने की दिशा में निर्णायक कदम मानी जा रही है। वहीं कजाकिस्तान के लिए भी यह सौदा बेहद महत्वपूर्ण है।

दुनिया के कुल यूरेनियम उत्पादन में 40-43 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला यह देश अब भारत जैसे तेजी से बढ़ते बाजार के साथ अपनी पकड़ और मजबूत कर रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि इस समझौते से वैश्विक ‘स्पॉट मार्केट’ पर दबाव बढ़ेगा, क्योंकि बड़ी मात्रा में यूरेनियम अब दीर्घकालिक अनुबंध के तहत लॉक हो जाएगा। इससे अन्य देशों के लिए आपूर्ति सीमित हो सकती है और प्रतिस्पर्धा और तेज होगी।रणनीतिक दृष्टि से भी यह सौदा भारत के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है। इससे पश्चिमी देशों और रूस के साथ भविष्य में होने वाली परमाणु वार्ताओं में भारत की सौदेबाजी की स्थिति मजबूत होगी।हालांकि डील से जुड़े कई व्यावसायिक पहलुओं जैसे शिपमेंट और डिलीवरी शेड्यूल को गोपनीय रखा गया है, लेकिन विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह समझौता कजाकिस्तान की उत्पादन क्षमता के बड़े हिस्से को कई वर्षों के लिए सुरक्षित कर लेगा। स्पष्ट है कि भारत अब केवल ऊर्जा खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक निर्णायक खिलाड़ी बनकर उभर रहा है।

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