नई दिल्ली, 03 मई (अशोक “अश्क”) भारत और चीन के सहयोग से प्रस्तावित कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026 अब नए विवाद में घिर गई है। नेपाल ने लिपुलेख दर्रे के रास्ते होने वाली इस यात्रा पर कड़ा ऐतराज जताते हुए भारत और चीन दोनों को आधिकारिक पत्र भेज दिया है। नेपाल ने स्पष्ट कहा है कि यह मार्ग उसके संप्रभु क्षेत्र से होकर गुजरता है और इस पर किसी भी गतिविधि से पहले उसकी सहमति आवश्यक है। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में 1816 की सुगौली संधि का हवाला देते हुए कहा कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी नेपाल का अभिन्न हिस्सा हैं। सरकार का कहना है कि इन क्षेत्रों पर उसका पूर्ण अधिकार है और किसी भी तरह की गतिविधि उसकी संप्रभुता का उल्लंघन मानी जाएगी।

नेपाल ने भारत से अपील की है कि वह इस क्षेत्र में सड़क निर्माण, सीमा व्यापार या कैलाश मानसरोवर यात्रा जैसी गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से रोके। साथ ही चीन को भी औपचारिक रूप से सूचित कर दिया गया है कि लिपुलेख पूरी तरह नेपाली क्षेत्र है। इस कदम के बाद क्षेत्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। गौरतलब है कि भारत सरकार ने हाल ही में कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026 के आयोजन की घोषणा की है। जून से अगस्त के बीच प्रस्तावित इस यात्रा के लिए 20 बैच निर्धारित किए गए हैं, जिनमें 10 बैच उत्तराखंड स्थित लिपुलेख पास और 10 बैच सिक्किम के नाथू ला मार्ग से गुजरेंगे।

प्रत्येक बैच में 50 श्रद्धालुओं को शामिल किया जाना है। तनाव के इस माहौल के बीच नेपाल ने यह भी संकेत दिया है कि वह इस विवाद का समाधान कूटनीतिक माध्यमों से चाहता है। नेपाल सरकार का कहना है कि ऐतिहासिक दस्तावेजों, मानचित्रों और तथ्यों के आधार पर वह भारत के साथ अपने पारंपरिक मैत्रीपूर्ण संबंधों को बनाए रखते हुए इस मुद्दे का शांतिपूर्ण हल निकालने के लिए प्रतिबद्ध है।

















