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यादों का खामोश सफर

आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में तमिलनाडु, चेन्नई की सुप्रसिद्ध कवयित्री शिल्पा बम्ब (जैन) जी की एक बेहद खूबसूरत ग़ज़ल

दिल की बस्ती को यूँ वीरान बनाने वाले।

फिर कहाँ लौट के आते हैं वो जाने वाले।

जिन की खुशबू से महकते थे ये आँगन मेरे,

अब कहाँ ढूँढूँ वो कलियो को सजाने वाले।

वक्त की गर्द में गुम हो गए चेहरे कितने,

फिर भी आते हैं हमें याद वो आने वाले।

राह तकते हुए थकने लगीं आँखें मेरी,

खो गए नींद की दरिया में सुलाने वाले।

ज़िंदगी धूप के सहरा में झुलसती ही रही,

कहने को बातें बनाते हैं बनाने वाले।

आसमाँ सर पे उठा रखा था कल तक जिसने,

आज सोए हैं ज़मीं में वो ज़माने वाले।

अब तो पत्थर की लकीरों सा सफ़र है मेरा,

सुन ज़रा साथ मेंरा छोड़ के जाने वाले।

अपनी आहों का असर ढूँढ रही हूँ कब से,

क्यों गए छोड़ के मुझको वो हंसाने वाले।

दास्ताँ इश्क़ की अब कोई सुनेगा कैसे,

सो गए खा़क की चादर में सुनाने वाले।

। ~ शिल्पा बम्ब (जैन)

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