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पत्थर से टकराएंगे

आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में मध्यप्रदेश, छिंदवाड़ा से सुविख्यात कवयित्री दीपशिखा ‘सागर’ जी की एक गीत

शीश ऐसे ही पत्थर से टकराएंगे,

यत्न करके भी सौ मिल कहाँ पाएंगे।

रक्त से प्रेमियों के जो लिक्खी गई,

हम उन्हीं सूचियों में गिने जाएंगे….

नैन की भूल थी साथ दिल ने दिया,

संग जीने का मरने का प्रण ले लिया।

जातियां थीं अलग धर्म कब एक था,

यूँ इरादा तो इस प्रेम का नेक था।

हम ने मिलकर चुना नेह अनुराग था,

सोचते थे जगत को भी ठुकरायेंगे…….हम उन्हीं….

ओढ़नी पर लगाये गए दाग़ भी,

इन प्रथाओं ने ढोये हैं बैराग भी।

ख़त्म हो ना सकीं वृत्तियां आसुरी,

मान के नाम पर नोंच दी पांखुरी।

देव पाषाण के सुप्त हैं जब सभी,

कैसे मधुरिम मिलन के वो क्षण आएंगे… हम उन्हीं….

सिर कटाना पड़ा जो उठाया ज़रा,

कर्ज़ सांसों का सांसों ने हँस के भरा।

हम मनुजता के मारे मरे द्वार पर,

प्रेम में प्रेम की हर प्रथा हार कर।

जान पाए नहीं होगा विद्रोह तो, छल प्रपंचो के साये भी मंडराएँगे….

। ~ दीपशिखा ‘सागर’

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