आज साहित्यिक आंगन में बिहार, समस्तीपुर जिले के अशोक “अश्क” की एक ग़ज़ल

सीने में दफ़्न अपनी हर दास्तान लेकर।
बाँधा कफ़न है सिर पे हाथों में जान लेकर।
रोटी तलाशता हो जो हर घड़ी यहाँ पर,
वो क्या करेगा आखिर दुनियाँ की शान लेकर।
ख्वाहिश नहीं मुझे है इन शान-ओ-शौक़तों की,
रखलो तुम्हीं ऐ यारों दुनियाँ जहान लेकर।
हिस्से में भाइयों ने बाँटा जो घर की दौलत,
मैं खुश हूँ पूर्वजों का टूटा मकान लेकर।
क्या सोचकर रुका है बढ़ते हुए कदम फिर,
क्यों रह गया मुसाफ़िर साज-ओ-समान लेकर।
~’अश्क’


















