Image

हाथों में जान लेकर

आज साहित्यिक आंगन में बिहार, समस्तीपुर जिले के अशोक “अश्क” की एक ग़ज़ल

सीने में दफ़्न अपनी हर दास्तान लेकर।

बाँधा कफ़न है सिर पे हाथों में जान लेकर।

रोटी तलाशता हो जो हर घड़ी यहाँ पर,

वो क्या करेगा आखिर दुनियाँ की शान लेकर।

ख्वाहिश नहीं मुझे है इन शान-ओ-शौक़तों की,

रखलो तुम्हीं ऐ यारों दुनियाँ जहान लेकर।

हिस्से में भाइयों ने बाँटा जो घर की दौलत,

मैं खुश हूँ पूर्वजों का टूटा मकान लेकर।

क्या सोचकर रुका है बढ़ते हुए कदम फिर,

क्यों रह गया मुसाफ़िर साज-ओ-समान लेकर।

~’अश्क’

Releated Posts

नवाज़िश

आज सेअहितयिक आंगन में उत्तर प्रदेश, अयोध्या की सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ स्वदेश मल्होत्रा ‘रश्मि’ जी एक ग़ज़ल दुनिया…

मज़लूम ज़िल्ल्तों से निकाले कहाँ गये

आज साहित्यिक आंगन में सुप्रसिद्ध कवयित्री कविता सिंह “वफ़ा” जी की एक शानदार ग़ज़ल अम्नो अमान चाहने वाले…

हौसला

आज साहित्यिक आंगन में तमिलनाडू, चेन्नई की सुप्रसिद्ध कवयित्री शिल्पा बम्ब (जैन) जी की एक दिलकश मुक्तक मिलेगी…

लफ़्ज़ों को ख़ून दिल का पिला कर ग़ज़ल कहो

आज साहित्यिक आंगन में बिहार, बेगूसराय की सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ सुनीता ‘सुमन’ जी की एक ग़ज़ल लौ फ़िक्र…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

<label for="comment">Comment's</label>

Scroll to Top