पटना, 07 जून (अविनाश कुमार) ,बिहार विधान परिषद की 10 सीटों (9 द्विवार्षिक और 1 उपचुनाव) के लिए होने वाले चुनाव ने राज्य की राजनीति का तापमान बढ़ा दिया है। एनडीए ने अपने सभी उम्मीदवारों के नाम घोषित कर तस्वीर लगभग साफ कर दी है, लेकिन विपक्षी खेमे में अब भी सस्पेंस बरकरार है। सबसे ज्यादा चर्चा उस एक सीट को लेकर है, जो मौजूदा संख्या बल के हिसाब से महागठबंधन के खाते में जाती दिख रही है। इसी एक सीट के लिए राजद के भीतर जबरदस्त खींचतान शुरू हो गई है। एनडीए की ओर से भाजपा ने चार, जेडीयू ने चार और लोजपा (रामविलास) ने एक उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर दिया है।

वहीं राजद अब तक अपने उम्मीदवार के नाम पर अंतिम फैसला नहीं कर पाया है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार विधान परिषद चुनाव में जीत के लिए एक उम्मीदवार को कम से कम 28 विधायकों के प्रथम वरीयता मतों की जरूरत होती है, जबकि राजद के पास अपने केवल 25 विधायक हैं। ऐसे में पार्टी को कांग्रेस और AIMIM के समर्थन की आवश्यकता पड़ेगी। राजद के सामने सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक और राजनीतिक संतुलन साधने की है। एक ओर AIMIM चाहती है कि मुस्लिम समुदाय से जुड़े चेहरे को मौका मिले, क्योंकि राज्यसभा चुनाव में उसके विधायकों ने महागठबंधन का समर्थन किया था। दूसरी ओर पार्टी के वरिष्ठ नेता और बिस्कोमान के पूर्व अध्यक्ष सुनील सिंह की दावेदारी भी मजबूत मानी जा रही है।

राजपूत समाज से आने वाले सुनील सिंह के पक्ष में पार्टी का एक प्रभावशाली वर्ग खुलकर पैरवी कर रहा है। इस बीच सियासी गलियारों में तेजस्वी यादव के फैसले पर सबकी नजर टिकी है। माना जा रहा है कि उम्मीदवार चयन का असर आगामी विधानसभा चुनावों के सामाजिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है। उधर, एनडीए सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा की भूमिका को लेकर भी अटकलें तेज हैं। उनके बेटे दीपक प्रकाश के लिए अब तक सीट घोषित नहीं होने से राजनीतिक चर्चाएं गर्म हैं। कुशवाहा ने फिलहाल संकेतों में ही जवाब दिया है, “इंतजार कीजिए, अभी बहुत समय है।” ऐसे में विधान परिषद चुनाव की यह जंग आने वाले दिनों में और दिलचस्प होने की संभावना है।


















