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यूएन रिपोर्ट में भारत पर अंतरराष्ट्रीय कानून उल्लंघन का आरोप, इजराइल संबंधों पर उठे सवाल

नई दिल्ली, 21 अप्रैल (अशोक “अश्क”) संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट ने भारत की विदेश नीति को लेकर वैश्विक स्तर पर बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट में भारत पर अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन का गंभीर आरोप लगाया गया है, खासकर इजराइल के साथ उसके रणनीतिक संबंधों और युद्ध समर्थन को लेकर। ‘टॉर्चर एंड जेनोसाइड’ शीर्षक वाली यह रिपोर्ट फ्रांसेस्का अल्बानीज ने 23 मार्च को मानवाधिकार परिषद में पेश की। अल्बानीज ने कहा कि भारत, इजराइल के साथ करीबी सैन्य और कूटनीतिक संबंधों के चलते अपने अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का उल्लंघन कर सकता है।

उन्होंने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के उस फैसले का हवाला दिया, जिसमें इजराइल के कब्जे को अवैध बताया गया और देशों से हथियार आपूर्ति रोकने का आग्रह किया गया था। इसके बावजूद भारत द्वारा कथित हथियार आपूर्ति को नियमों के विपरीत बताया गया है। रिपोर्ट में गाजा की स्थिति को लेकर भी चौंकाने वाले दावे किए गए हैं। कहा गया है कि अक्टूबर 2023 से फिलिस्तीनियों के खिलाफ व्यवस्थित यातना दी जा रही है और पूरे गाजा को एक विशाल “यातना शिविर” में तब्दील कर दिया गया है।

निगरानी, फेस रिकग्निशन, ड्रोन और चेकपॉइंट्स के जरिए आम नागरिकों के जीवन पर कड़ा नियंत्रण बताया गया है। अल्बानीज ने भारत की नैतिक जिम्मेदारी पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि भारत का ऐतिहासिक दृष्टिकोण न्याय और मानवाधिकारों के पक्ष में रहा है, लेकिन मौजूदा रुख इससे अलग दिखाई देता है। उन्होंने नरेंद्र मोदी की फरवरी में इजराइल यात्रा और ‘स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ का जिक्र करते हुए इसे वैश्विक व्यवस्था को कमजोर करने वाला कदम बताया। रिपोर्ट के अनुसार, गाजा में लगभग 1,90,000 लोग बेहद सीमित क्षेत्र में रह रहे हैं, जहां दवाइयों, साफ-सफाई और सुरक्षा की भारी कमी है।

इसे “कंसंट्रेशन कैंप” से भी बदतर स्थिति बताया गया है। साथ ही वकीलों, डॉक्टरों, पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को निशाना बनाए जाने की भी बात कही गई है। अल्बानीज ने चेतावनी दी कि जब यातना एक संगठित प्रणाली बन जाए, तो यह केवल व्यक्तिगत घटनाएं नहीं बल्कि राज्य नीति का संकेत होती है। हालांकि, कोलंबिया, दक्षिण अफ्रीका, स्पेन, स्लोवेनिया और मलेशिया जैसे देश इस स्थिति को रोकने के प्रयास कर रहे हैं, लेकिन वैश्विक दबाव के कारण ठोस कार्रवाई अभी भी चुनौती बनी हुई है।

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