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मेरा गाँव

आज साहित्यिक आँगन गीत गुंजन में राजस्थान, जयपुर से सुप्रसिद्ध कवयित्री अनामिका कली जी की एक गीत

दिल में मेरा गांव रखे है ,जीवन का आधार।

देने को यह सुंदर जीवन,बहुत बहुत आभार।।

नदी,खेत,खलियान सभी तो,जोहें मेरी बाट।

इस बावरे शहर में मिलते ,कहाँ हैं ऐसे ठाट।

वो महुआ की महक निराली,लेती तुझको मोह।

शहरी सभी आवोहवा भी, लगती चंदनगोह।

माना मुझसे दूर रहा है, मेरा प्यारा गाँव।

लेकिन देता रहा सदा ही,मुझको माँ सी छाँव।

खोकर अपना असलीपन,बिगड़ा है परिवेश।

गाँव, गाँव अब कहाँ रहा है, ओढ़ा शहरी वेष।

सुविधाओं का जंजालीपन,करता इसको दूर।

लूट रहा यह नया ज़माना , इसको है भरपूर।

बड़ी वेदना झेल रहा यह , प्यारा गाँव अतीत।

साँझ समय की बेला में ही,समय रहा है बीत।

रोको इसका दोहन कोई, खोता यह अस्तित्व।

काश!गाँव के साथ सदा ही,सधता हर व्यक्तित्व।

~ अनामिका कली

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