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पापा

आज साहित्यिक आँगन गीत गुंजन में बिहार, बेगूसराय से सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ सुनीता ‘सुमन’ जी की एक कविता

महज़ एक अहसास ही नहीं

मेरा अस्तित्व आपसे है

इसलिए अपने वजूद को

कभी आपसे विलग पाया ही नहीं

ये और बात है आपकी

स्नेहिल छाया से महरूम

मेरा बचपन ढुंढता रहा सदा

कभी दरख़्तों की छांव में

कभी माता के पांव में

किन्तु बढ़ती ही रही

संधर्षमय जीवन के सफ़र में

बहुत कुछ ऐसा थाजो छूटता रहा

पीछे , बहुत पीछे

पर मुड़कर देखने से बेहतर

जीवन पथ पर अग्रसर रही

क्योंकि

अपनी आँखों में हमेशा पाया

“पापा”… ..मैंने आपकी छवि….

~ डॉ सुनीता ‘सुमन’

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