नई दिल्ली, 16 अप्रैल (अशोक “अश्क”) मिडिल ईस्ट में फरवरी 2026 के अंत में शुरू हुए युद्ध ने भारत की ईंधन सप्लाई चेन को बुरी तरह झकझोर दिया है। सबसे ज्यादा असर एलपीजी (LPG) आपूर्ति पर पड़ा है, जिससे आम लोगों से लेकर कारोबारियों तक की चिंता बढ़ गई है। हालात इतने गंभीर हैं कि विशेषज्ञों के मुताबिक स्थिति सामान्य होने में अभी लंबा समय लग सकता है। हालांकि ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर को लेकर सहमति बनी है और पाकिस्तान में भी वार्ता का दौर शुरू हो चुका है, लेकिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की स्थिति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई है।

गौरतलब है कि भारत के कुल एलपीजी आयात का लगभग 90% हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है।सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इस संकट से उबरने में भारत को कम से कम 3 से 4 साल का समय लग सकता है। विदेशी आपूर्तिकर्ताओं ने संकेत दिए हैं कि कई महत्वपूर्ण उत्पादन केंद्र बंद हो चुके हैं, जिससे सप्लाई को युद्ध-पूर्व स्तर पर लाने में 36 से 48 महीने लग सकते हैं। खाड़ी देशों UAE, कतर और सऊदी अरब से आने वाली आपूर्ति भी घटकर 55% रह गई है।

इस आपूर्ति संकट का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ा है। मार्च में घरेलू 14.2 किलो सिलेंडर की कीमत 60 रुपये बढ़कर दिल्ली में करीब 913 रुपये हो गई है। वहीं 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर की कीमत 1 अप्रैल को 195.50 रुपये बढ़कर 2,078.50 रुपये पहुंच गई, जिससे होटल, रेस्टोरेंट और छोटे उद्योगों पर भारी दबाव पड़ा है। बढ़ते संकट को देखते हुए सरकार अब पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) को तेजी से बढ़ावा दे रही है।

मार्च 2026 में सरकार ने पाइपलाइन वाले क्षेत्रों में 90 दिनों के भीतर PNG अपनाने का निर्देश दिया है। साथ ही 5,000–6,000 करोड़ रुपये के निवेश से पाइपलाइन नेटवर्क विस्तार की योजना बनाई गई है, जिसमें 50% तक लागत सरकार वहन कर सकती है।फिलहाल देश में केवल 1.6 करोड़ घरों में PNG कनेक्शन है, जिसे 2034 तक 12 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।


















