नई दिल्ली, 20 अप्रैल (अशोक “अश्क”) अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी टीम पाकिस्तान में शांति वार्ता को लेकर पूरी तरह तैयार थे। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ट्रंप के दामाद जारेड कुशनर के नेतृत्व में एक विशेष अमेरिकी दल पाकिस्तान के लिए रवाना हो चुका था। इस्लामाबाद में माहौल शांतिपूर्ण था, और दुनिया भर में यह उम्मीद जताई जा रही थी कि अब अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की प्रक्रिया में सकारात्मक बदलाव आएगा।

लेकिन कुछ ही घंटों में सारी उम्मीदें चूर-चूर हो गईं, जब ईरान ने एक बड़े झटके के रूप में साफ कर दिया कि वह पाकिस्तान में होने वाली शांति वार्ता में शामिल नहीं होगा। ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी ‘इरना’ के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच इस वार्ता की पूरी प्रक्रिया अब न केवल जटिल हो चुकी है, बल्कि यह पटरी से भी उतर चुकी है। ईरान ने वाशिंगटन की शर्तों को खारिज करते हुए कहा कि अमेरिका अपनी असंगत मांगों और भ्रामक पैंतरे बदलने से बाज नहीं आ रहा, जिससे कोई भी सार्थक वार्ता असंभव हो चुकी है।

वार्ता की सबसे बड़ी अड़चन बनी हॉर्मुज जलसंधि, जहां इन दिनों दोनों देशों की नौसेनाएं आमने-सामने खड़ी हैं। ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने उसकी बंदरगाहों और हॉर्मुज जलसंधि पर नौसैनिक नाकेबंदी जारी रखी है, जो सीजफायर के समझौते का उल्लंघन है। ईरान का कहना है कि एक तरफ अमेरिका उसे धमकियां दे रहा है, और दूसरी तरफ शांति की बात कर रहा है, जो बिल्कुल असंगत है। ट्रंप के उकसावे भरे बयानों ने भी ईरान का गुस्सा बढ़ा दिया है। ‘इरना’ के मुताबिक, ईरान का कहना है कि इन धमकियों के माहौल में कोई भी शांति वार्ता नहीं हो सकती।

पाकिस्तान ने स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए अपनी पूरी कोशिशें तेज कर दीं। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने तुरंत ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची से संपर्क किया और शांति वार्ता का दरवाजा पूरी तरह बंद न करने की अपील की। अब पाकिस्तान अपनी कूटनीतिक प्रतिष्ठा को बचाने के लिए किसी भी हालात में इस संकट को सुलझाने की कोशिश कर रहा है, ताकि विश्व मंच पर उसकी फजीहत न हो।
















