Image

दिल को क्या अब कभी आराम नहीं आएगा

आज साहित्यिक आंगन में उस्ताद सय्यद मंसूर कमाल साहब के शागिर्द उत्तर प्रदेश, बहराइच के सुप्रसिद्ध शायर बशीर मिर्ज़ा जी की एक ग़ज़ल

वो सरे शाम लबे बाम नहीं आएगा।

रात भर मुझको भी आराम नहीं आएगा।।

मेरा वअदा है तेरा ज़िक्र करूंगा न कभी।

मेरे होंठों प तेरा नाम नहीं आएगा।।

मैनें ले रक्खा है ख़ुद क़त्ल का अपने ज़िम्मा।

अब तिरे सर कोई इल्ज़ाम नहीं आएगा।।

बेवजह बैठा है मैख़ाने में उम्मीद लिए।

छूने होटों कोई जाम नहीं आएगा?

ज़िन्दगी अब शबे दैजूर हुई जाती है।

दिल को क्या अब कभी आराम नहीं आएगा।।

चाँद ने ख़ुद को छुपा रक्खा है बादल में कहीं।

अब अंधेरों को भी आराम नहीं आएगा।।

मैं तुम्हें नक्श या तावीज बना दूं लेकिन

पर वज़ीफ़ा ये तेरे काम नहीं आएगा।।

मैं असा बन के तेरे साथ चलुंगा उस पल।

जब नज़र तुझको कोई गाम नहीं आएगा ।।

मैंने ख़ुद को यही कहकर के संभाला है “बशीर”

अब तेरे चाँद का पैग़ाम नहीं आएगा।।

। ~बशीर मिर्ज़ा

Releated Posts

कविता जो कभी नहीं लिखी

आज साहित्यिक आंगन में उत्तर प्रदेश, बहराइच की सुप्रसिद्ध कवयित्री विनीता सिंह विनी की एक कविता घुमड़ रहे…

ज़माने भर को यूँ हैरत में डाल रख्खा है

आज साहित्यिक आंगन में मध्यप्रदेश, भोपाल की सुप्रसिद्ध कवयित्री अलका “राज” अग्रवाल की एक ग़ज़ल .ज़माने भर को…

बज़्मे मोहब्त को सजाने निकले

साहित्यिक आंगन में आज उत्तर प्रदेश बिजनौर की सुप्रसिद्ध शायरा अफ़रोज़ अज़ीज़ जी की ग़ज़ल दिल के सोये…

मां का घर भी

आज सहितिक आंगन में बालाघाट, मध्यप्रदेश के सुप्रसिद्ध कवि अशोक सिहांसने “असीम” जी की एक ग़ज़ल गाँवों में…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

<label for="comment">Comment's</label>

Scroll to Top