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कल रात ‘अश्क’ अपने ही साये से डर गया

आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में बिहार, समस्तीपुर से अशोक “”अश्क” की एक ग़ज़ल

रखता नहीं खबर कि वो जाने किधर गया।

जो भी मेरी निग़ाह से यारों उतर गया।

तुमसे मिली नज़र और मिलके ठहर गया,

कुछ ऐसे मेरे रूह में है तू उतर गया।

आँधी उड़ा के ले गई हर पेड़ साथ में,

क्या था कसूर जिनका घरौंदा उजड़ गया।

लड़ता रहा अकेला ही सारे जहान से,

ठोकर लगी जो इश्क में वो भी बिखर गया।

जब जब सहा गया नहीं मयखाने चल पड़ा,

इक घूंट पी शराब तो हर ज़ख्म भर गया।

हैं जद में कैद खौफ़ की क्यों इस कदर खुदा,

कल रात ‘अश्क’ अपने ही साये से डर गया।

~ अशोक “अश्क”

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