आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में तमिलनाडु, चेन्नई से सुप्रसिद्ध कवयित्री शिल्पा जैन जी की एक गीत

तेरी पूजा करूंगी माँ।
दीया बनकर जलूंगी माँ।
अभी आता नहीं कुछ भी,
मुझे भाता नहीं कुछ भी।
अभी मुश्किल से समझी हूं,
सभी से बस ये कहती हूं।
तेरी खातिर ज़माने से,
अकले ही लडूंगी माँ।
मुझे तूने बनाया है,
मेरा जीवन सजाया है।
तुझे पाकर ये जाना है,
जमाना क्यों दिवाना है।
बुढ़ापे में तेरे हाथों,
की लाठी मैं बनूँगी माँ।
लिखूंगी जब कभी तुझको,
मिलेंगे शब्द क्या मुझको।
नहीं लिख पाऊंगी कुछ भी,
मगर तू है माँ अमृत सी।
लिखूंगी जब कभी खुद को,
तो तुझको ही लिखूंगी माँ।
कलेजा थाम कर अपना,
पिरोया तूने सपनों को।
लगाये रात दिन तूने,
रखा खुश सारे अपनों को।
तेरे अहसान है इतने,
उन्हें कब तक गिनूंगी माँ।
मुझे आगे बढ़ाया है,
शिखर पर भी चढ़ाया है।
ज़माने भर से लड़ने का,
हुनर तूने सिखाया है।
भले आगे रहूं सबसे,
तेरे पीछे चलूँगी माँ।
तेरी पूजा करूंगी माँ।
दीया बनकर जलूंगी माँ…….।
~ शिल्पा जैन

















