आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में मध्यप्रदेश, उज्जैन से सुप्रसिद्ध कवि सीआर के जैन “राकेश” जी की एक ग़ज़ल

ज़िंदगानी में कुछ तज़रिबे मिल गए,क़ामयाबी के नुस्ख़े नए मिल गए।राहे उल्फ़त में हम जो चले दो क़दम,हर क़दम पर नए मशवरे मिल गए।
नेकियों की डगर पर जो निकले थे हम,राह में लोग हमको भले मिल गए।
फूल की चाह में बागबाँ जब चले,रास्ते में कई आबले मिल गए।
मंज़िलों की तरफ़ हम अकेले चले,रास्ते में कई क़ाफ़िले मिल गए।
ढूँढते थे जिसे हम गली-कूचे में,सामने वो हमें देखिए मिल गए।
खो गए थे जो कल भीड़ के शोर में,अपनी पहचान वो ढूँढते मिल गए।वक़्त की धूप में जब झुलसने लगे,साये कुछ पेड़ के भी घने मिल गए।
थक के गिरने लगे राह में जब कभी,सामने हौसले फिर बड़े मिल गए।जब लिखी दास्ताँ अपनी ‘राकेश’ ने,अश्क पन्नों पे उभरे हुए मिल गए।
~ आर के जैन “राकेश”

















