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कविता जो कभी नहीं लिखी

आज साहित्यिक आंगन में उत्तर प्रदेश, बहराइच की सुप्रसिद्ध कवयित्री विनीता सिंह विनी की एक कविता

घुमड़ रहे हैं घन शब्दों के,

मन में जैसे प्रहार,

हर डाली पर खिली हुई है,

कविता की झंकार।

भाँति-भाँति की पंक्तियाँ जागें,

सीमाएँ सब तोड़,

मुखर हुईं वर्जनाएँ सारी,

मन के खोले किवाड़।

कली-कली चिटकी है देखो,

शब्दों से मिलने को आतुर-

कविता जो लिखी नहीं अबतक,

कैसे लिख पाऊँगी…

रक्त-शिराओं में बहती है,

शब्दों की अनुगूँज,

अंतर से वन-उपवन तक,

फैली इसकी धुन।

कोशिकाओं में धड़क रही है,

आवाज़ कोई गहरी,

आर्तनाद से विजय-घोष तक,

यात्रा ठहरी-ठहरी।

अनबुझ सी पहेली है ये,

अन्तस् पीड़ा ढोती—

कविता जो लिखी नहीं अबतक,

कैसे लिख पाऊँगी…

स्याह-सफेद सी रेखाएँ,

हृदयांगन में नाचें,

लाजवंती सी भावनाएँ,

धीरे-धीरे आँचें।

अक्षर-अक्षर बिखरे जैसे,

टूटे बंदनवार,

कब बिखरी मन की ये माला,

किसने तोड़ा प्यार?

केशों में उलझी है मेधा,

अधरों पर ठहरा नेह—

कविता जो लिखी नहीं अबतक,

कैसे लिख पाऊँगी…

शायद जब ये पीड़ा बोले,

शब्द स्वयं बन जाएँ—

तब मेरी ये अनलिखी कविता,

खुद-ब-खुद बह जाए…

~विनीता सिंह विनी

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