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JP इंफ्राटेक डील पर सुप्रीम कोर्ट में टकराव, अडानी बनाम वेदांता की जंग ने पकड़ा तूल

नई दिल्ली, 06 अप्रैल (अशोक “अश्क”) जेपी इंफ्राटेक के अधिग्रहण को लेकर छिड़ी कॉर्पोरेट जंग अब देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंच गई है, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान अहम निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने साफ कहा है कि मॉनिटरिंग कमेटी यदि किसी भी बड़े नीतिगत फैसले की ओर बढ़ती है, तो उसे पहले National Company Law Appellate Tribunal से अनुमति लेनी होगी।

यह विवाद उस समय और गहरा गया जब Vedanta Limited ने Adani Group द्वारा जेपी इंफ्राटेक की संपत्तियों के अधिग्रहण को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वेदांता ने National Company Law Tribunal के उस फैसले को गलत ठहराया, जिसमें अडानी समूह के रेजोल्यूशन प्लान को मंजूरी दी गई थी।सुनवाई के दौरान वेदांता की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने जोरदार दलील पेश करते हुए कहा कि उनकी कंपनी की बोली अडानी समूह से 3000 करोड़ रुपये अधिक थी।

उन्होंने अदालत को बताया कि वेदांता को आधिकारिक रूप से सबसे ऊंचा बोलीदाता घोषित किया गया था, लेकिन इसके बावजूद प्रक्रिया में गंभीर विसंगतियां बरती गई। वेदांता ने कोर्ट से अपील की कि जब तक मामले की पूरी सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक संपत्तियों का ट्रांसफर रोका जाए। खासतौर पर फॉर्मूला-1 ट्रैक और अन्य बड़े प्रोजेक्ट्स को लेकर कंपनी ने चिंता जताई। वहीं, जेपी इंफ्राटेक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि रेजोल्यूशन प्रोफेशनल ने यह स्पष्ट नहीं किया कि किसकी योजना बेहतर थी। दूसरी ओर, अडानी समूह का पक्ष रखते हुए मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि वेदांता ने शुरुआती चरण में इस योजना का विरोध नहीं किया था। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि क्रेडिटर्स की समिति (COC) के किसी भी बड़े फैसले के लिए संबंधित प्राधिकरणों की मंजूरी जरूरी है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल हस्तक्षेप से इनकार करते हुए कहा कि मामला पहले से ही 10 अप्रैल को NCLAT में सूचीबद्ध है। अदालत ने NCLAT से तय तारीख पर सुनवाई करने का अनुरोध किया और कोई नया स्टे ऑर्डर जारी नहीं किया। यह पूरा मामला जेपी इंफ्राटेक की वित्तीय बदहाली और कर्जदाताओं की वसूली से जुड़ा है, जिसने कॉर्पोरेट जगत में हलचल मचा दी है।

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