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रात दिन रहता है तेरी याद का दफ्तर खुला

आज साहित्यिक आँगन गीत गुंजन में पश्चिम बंग, आसनसोल से सुप्रसिद्ध शायरा ग़़ज़ाला तबस्सुम जी की एक ग़ज़ल

पुश्त की आँखों में है अब भी वही मंज़र खुला।

घूमते ही मेरे कैसे आपका ख़ंजर खुला।

और मैं जाऊं कहां छोड़ कर ये दर खुला,

रात दिन रहता है तेरी याद का दफ्तर खुला।

दी सदा तो एक इक कर शहर का हर घर खुला,

हो गया गर बंद इक दर दूसरा इक दर खुला।

ऐन मुमकिन था मरासिम फिर से हो जाते बहाल,

छोड़ देते वापसी का कोई तो इक दर खुला।

उठ गईं नज़रें दरीचे की तरफ़ बेसाख़्ता,

रुक गए मेरे क़दम ख़ुद देख कर इक घर खुला।

पड़ गई अहले सुखन की आखिरश मुझ पर नजर,

“ख़ुल्द का इक दर है मेरी गोर के अंदर खुला”।

आपके एहसास से हम रू-ब-रू तो थे मगर,

ख़ुद पे गुज़रा सानेहा तो शेर कुछ बेहतर खुला।

कोई लफ़्ज़ों में बयां कर दे मेरे रंजो अलम,

हूं कफ़स में क़ैद और सामने अम्बर खुला।

फूल खुशबू रंग तितली हो मुबारक आपको,

ज़िंदगी अपने लिए कांटों का बिस्तर खुला।

~ ग़़ज़ाला तबस्सुम

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