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मिर्च के खेतों में छाया संकट: दाम घटने से किसानों के टूटे सपने, लागत निकालना भी हुआ मुश्किल

पटना, 08 जून (पटना डेस्क) किसानों के जीवन में मिठास घोलने वाली हरी मिर्च की खेती इस वर्ष उनके लिए कड़वी साबित हो रही है। कभी तरक्की और खुशहाली की पहचान बनी हरी मिर्च अब किसानों की चिंता का कारण बन गई है। बाजार में कीमतों में भारी गिरावट के चलते किसानों के चेहरे मुरझा गए हैं। हालांकि किसानों को अब भी उम्मीद है कि आने वाले दिनों में मिर्च के दामों में उछाल आएगा और उन्हें राहत मिलेगी।मधेपुरा जिले के बिहारीगंज प्रखंड क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों से हरी मिर्च की खेती तेजी से बढ़ी थी। इस क्षेत्र की मिर्च न केवल बिहार के विभिन्न जिलों बल्कि पश्चिम बंगाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के बड़े बाजारों तक पहुंचती रही है।

इसके अलावा नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में भी यहां की मिर्च की मांग रही है। बेहतर बाजार और अच्छे दाम मिलने के कारण किसानों ने बड़े पैमाने पर इसकी खेती शुरू की थी।लेकिन इस वर्ष हालात पूरी तरह बदल गए हैं। खेतों में मिर्च की भरपूर पैदावार होने के बावजूद किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। किसानों का कहना है कि जहां पिछले वर्ष मिर्च 6 हजार से 8 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक बिक रही थी, वहीं इस बार उन्हें मात्र 1200 से 2000 रुपये प्रति क्विंटल की दर से मिर्च बेचनी पड़ रही है। निर्यात में आई बाधाओं और बाजार में मांग घटने को इसकी प्रमुख वजह माना जा रहा है।

किसान दिलीप मंडल, नीरज मेहता, संजय यादव, मु. फारूक, भरत मंडल, शिवानंद मंडल सहित अन्य किसानों ने बताया कि शुरुआत में वे कीमत बढ़ने की उम्मीद में कम मात्रा में तोड़ाई कर रहे थे, लेकिन खेतों में मिर्च पककर खराब होने लगी तो मजबूरी में पहली तोड़ाई करनी पड़ी। किसानों के अनुसार एक कट्ठा में मिर्च की खेती पर 15 से 20 हजार रुपये तक खर्च आता है। अच्छी कीमत मिलने पर 20 से 25 हजार रुपये तक मुनाफा होता था, लेकिन इस बार लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है। किसानों ने सरकार से हरी मिर्च पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) लागू करने तथा प्रखंड स्तर पर सरकारी खरीद केंद्र खोलने की मांग की है। उनका कहना है कि उचित मूल्य मिलने पर ही किसानों का मनोबल वापस लौट सकेगा और मिर्च की खेती का भविष्य सुरक्षित रह पाएगा।

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