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20 से 40% तक घट सकती है उर्वरकों की खपत: बीएयू सबौर में वैज्ञानिकों का बड़ा दावा, पर्यावरण दिवस पर सतत कृषि का रोडमैप तैयार

बक्सर, 5 जून (विक्रांत) विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर में आयोजित एक महत्वपूर्ण विचार-मंथन सत्र में कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने बिहार में रासायनिक उर्वरकों की खपत कम करने को लेकर बड़ा दावा किया। विशेषज्ञों का कहना है कि वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन, जैविक विकल्पों और आधुनिक तकनीकों के समन्वित उपयोग से राज्य में 20 से 40 प्रतिशत तक रासायनिक उर्वरकों की खपत कम की जा सकती है, जबकि फसल उत्पादकता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

मृदा विज्ञान विभाग द्वारा भारतीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग योजना सोसायटी (ISSLUP), सबौर चैप्टर के सहयोग से “बिहार में उर्वरक खपत को कम करने की रणनीतियाँ” विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य कृषि उत्पादन बनाए रखते हुए पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ खेती के उपायों पर व्यापक चर्चा करना था। कार्यक्रम का शुभारंभ बिहार कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने पौधारोपण कर किया। इस दौरान राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) के स्वयंसेवकों ने भी पौधारोपण अभियान में सक्रिय भागीदारी निभाई और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता मृदा विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. अंशुमान कोहली ने की। अपने स्वागत संबोधन में डॉ. कोहली ने बढ़ती उर्वरक लागत, घटती पोषक तत्व उपयोग दक्षता और पर्यावरणीय चुनौतियों का उल्लेख करते हुए संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन को समय की आवश्यकता बताया। मुख्य वक्ता डॉ. बिजय सिंह ने कहा कि उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। उन्होंने मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक अनुशंसा, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन तथा प्रिसिजन न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट को बढ़ावा देने पर जोर दिया।तकनीकी सत्र में विशेषज्ञों ने प्राकृतिक खेती, पोषक तत्व पुनर्चक्रण, जैविक विकल्पों, सूक्ष्मजीव आधारित इनोकुलेंट्स तथा वर्मी-कम्पोस्ट के उपयोग पर विस्तार से चर्चा की। प्रो. वी. पी. रमणी, डॉ. सत्येन्द्र कनौजिया, डॉ. संजय अरोड़ा, डॉ. महेश घाटाला और डॉ. शंकर झा ने अपने विचार साझा किए। वहीं डॉ. ए. के. झा. ने वर्मी-कम्पोस्ट के जरिए यूरिया पर निर्भरता कम करने की संभावनाएं बताईं।आधुनिक तकनीकों पर चर्चा करते हुए विशेषज्ञों ने ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), भू-स्थानिक तकनीकों तथा स्पेक्ट्रोस्कोपी आधारित मृदा परीक्षण को कृषि का भविष्य बताया। वक्ताओं ने कहा कि इन तकनीकों से उर्वरकों का सटीक उपयोग सुनिश्चित होगा, लागत घटेगी और मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर होगा।कार्यक्रम के अंत में विशेषज्ञों ने एकमत से कहा कि वैज्ञानिक, जैविक और तकनीकी उपायों के समन्वित उपयोग से बिहार में सतत कृषि को नई दिशा मिल सकती है। धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

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