देश देश को छलते देखे

आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में राजस्थान, जयपुर से सुप्रसिद्ध कवयित्री अनामिका कली जी की एक गीत

भीषण मातम पसर रहा है,

अब जीवन के उजिआरों में।

क्यों आज बहारें रूठी हैं,

इन अपने ही गलियारों में।

हँसती खुशियाँ धूँ धूँ जलतीं,

जीवन की सब ख्वाहिश मरतीं।

कितनी घातक आग उबलतीं,

इन अपने घर के द्वारों में ।

क्यों आज बहारें रूठी हैं ,

इन अपने ही गलियारों में।।

गीत बहारों के हम गाते ,

हँसी खुशी त्योहार मनाते।

पर सुर अब सारे ड़ूब रहे ,

इन श्वेत -श्याम अँधियारों में।

क्यों आज बहारें रूठीं हैं ,

इन अपने ही गलियारों में ।

सौंधी माटी की खुशबू भी,

बनी विषाणू की बदबू सी।

हाय!वैध की मजबूती भी,

टूटी इन करुण पुकारों में।

क्यों आज बहारें रूठीं हैं,

इन अपने ही गलियारों में।

आओ!मातम दूर भगायें ,

आशाओं के दीप जलायें।

खुद ही जाग्रत हम हो जायें,

अब अपने ही परिवारों में।

क्यों आज बहारें रूठीं हैं ,

इन अपने ही गलियारों में।

देश देश को छलते देखे,

छल के रूप बदलते देखे।

द्वंद्व अनेको पलते देखे,

संवेदनहीन विचारों में।

क्यों आज बहारें रूठीं हैं ,

इन अपने ही गलियारों में।

~ अनामिका कली

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