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गंगा पर थमी जिंदगी: मनिहारी–साहिबगंज फेरी सेवा बंद होने से बिहार-झारखंड का संपर्क टूटा, व्यापारियों में मचा हाहाकार

पटना, 07 मई (पटना डेस्क) गंगा नदी पर बिहार और झारखंड को जोड़ने वाली बेहद महत्वपूर्ण मनिहारी–साहिबगंज फेरी सेवा पिछले एक अप्रैल 2026 से पूरी तरह बंद पड़ी है। यात्री और मालवाहक जहाजों के संचालन पर अचानक ब्रेक लगने से दोनों राज्यों के बीच आवागमन और व्यापार बुरी तरह प्रभावित हो गया है। सीमांचल से लेकर झारखंड तक हजारों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी इस सेवा पर निर्भर थी, लेकिन अब इसका भविष्य अधर में लटक गया है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि लोगों को अब लंबा सड़क मार्ग अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इससे न केवल यात्रा में अधिक समय लग रहा है, बल्कि परिवहन लागत भी कई गुना बढ़ गई है।

सबसे ज्यादा परेशानी छोटे व्यापारियों और दैनिक यात्रियों को झेलनी पड़ रही है, जिनका कारोबार सीधे तौर पर इस नदी मार्ग पर आधारित था। फेरी सेवा की बंदोबस्ती को लेकर जिला प्रशासन ने अब तक दो बार निविदा जारी की, लेकिन दोनों ही बार कोई डाकवक्ता सामने नहीं आया। संचालक नहीं मिलने के कारण सेवा शुरू नहीं हो सकी। प्रशासन लगातार प्रयास कर रहा है, लेकिन निजी एजेंसियों की बेरुखी ने पूरे मामले को और उलझा दिया है। मनिहारी–साहिबगंज फेरी सेवा लंबे समय से दोनों राज्यों के बीच जीवनरेखा मानी जाती रही है। यह सेवा यात्रियों के साथ-साथ मालवाहक वाहनों के लिए भी बेहद अहम थी। रोजाना बड़ी संख्या में लोग इसी रास्ते से आवागमन करते थे। अब सेवा बंद होने से स्थानीय बाजारों की आपूर्ति श्रृंखला भी प्रभावित होने लगी है।

जानकारी के अनुसार, इस फेरी सेवा की बंदोबस्ती हर दो साल में बारी-बारी से साहिबगंज और कटिहार जिला प्रशासन द्वारा की जाती है। वर्ष 2024-25 और 2025-26 तक इसकी जिम्मेदारी साहिबगंज प्रशासन के पास थी। उस दौरान भी किसी निजी एजेंसी ने रुचि नहीं दिखाई थी, जिसके बाद सरकारी निगरानी में संचालन कराया गया। अब वर्ष 2026-27 और 2027-28 के लिए यह जिम्मेदारी कटिहार प्रशासन के पास आई है, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकल पाया है।स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि पहले जहां माल कुछ घंटों में पहुंच जाता था, अब उसमें पूरा दिन लग रहा है। ढुलाई खर्च बढ़ने से छोटे कारोबारी आर्थिक संकट में आ गए हैं। वहीं यात्रियों का कहना है कि फेरी सेवा बंद होने से उनकी दैनिक दिनचर्या पूरी तरह प्रभावित हो गई है।प्रशासन का दावा है कि सेवा को जल्द बहाल करने के लिए नई रणनीति पर काम किया जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक, यदि निजी संचालक आगे नहीं आते हैं तो सरकारी स्तर पर वैकल्पिक व्यवस्था पर भी विचार किया जा सकता है। हालांकि लगातार दो बार निविदा में किसी एजेंसी की रुचि नहीं आने से कई सवाल खड़े हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि संचालन लागत, जोखिम और कम मुनाफे के कारण निजी कंपनियां इससे दूरी बना रही हैं। फिलहाल लोगों की निगाहें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि गंगा की यह जीवनरेखा फिर कब चालू होगी और क्या लोगों को जल्द राहत मिल पाएगी।

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