नई दिल्ली, 23 अप्रैल (अशोक “अश्क”) वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल के बीच कच्चे तेल को लेकर भारत और चीन के बीच जबरदस्त प्रतिस्पर्धा छिड़ गई है। हालात ऐसे हैं कि कीमतों से ज्यादा अब तेल की उपलब्धता सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक चीन का कच्चे तेल आयात मार्च में सालाना आधार पर 2.8% गिरा है, जबकि ईरानी सप्लाई सीमित होने से उसने रूस का रुख तेज कर दिया है।

केप्लर के अनुसार, मार्च में चीन ने करीब 18 लाख बैरल प्रतिदिन रूसी तेल आयात किया, जो फरवरी के 19 लाख बैरल प्रतिदिन से थोड़ा कम है। वहीं अप्रैल में अब तक भारत और चीन के बीच सीधी टक्कर देखने को मिल रही है, जहां दोनों देश 16-16 लाख बैरल प्रतिदिन रूसी तेल खरीद रहे हैं। यह प्रतिस्पर्धा आने वाले समय में और तेज होने के संकेत दे रही है।इस बीच अमेरिकी दबाव के चलते भारत ने पहले रूसी तेल आयात में कटौती की थी। नवंबर में अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारतीय रिफाइनरों ने खरीद घटा दी थी।

फरवरी में भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के बाद यह आयात घटकर करीब 10.4 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था, जो पहले 18.4 लाख बैरल प्रतिदिन था। लेकिन ईरान युद्ध के बाद समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं और भारत ने फिर से रूसी तेल खरीद बढ़ा दी है।भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने हाल ही में संकेत दिया कि भारत तेजी से रूसी तेल खरीद रहा है और रूस इस ऊर्जा सहयोग को आगे भी बनाए रखना चाहता है। उन्होंने अमेरिकी प्रतिबंधों को ‘अवैध दबाव’ करार दिया। दूसरी ओर, सऊदी अरब के तेल को लेकर भी भारत और चीन में कड़ी होड़ मची है।

फरवरी में भारत की सऊदी से तेल खरीद बढ़कर 10.3 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गई थी, लेकिन अप्रैल में यह घटकर करीब 6.84 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई। वहीं सऊदी अरब ने चीन को अप्रैल में 13.5 लाख बैरल प्रतिदिन तेल सप्लाई किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मौजूदा तनाव और युद्धविराम की स्थिति लंबी चली, तो वैश्विक बाजार में तेल की किल्लत गहराने की आशंका है, जिससे आने वाले दिनों में ऊर्जा संकट और भी गंभीर रूप ले सकता है।

















