नई दिल्ली, 21 अप्रैल (अशोक “अश्क”) दुनिया की सुरक्षा राजनीति में बड़ा भूचाल लाते हुए जापान ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से चली आ रही अपनी शांतिवादी नीति में ऐतिहासिक बदलाव कर दिया है। अब तक घातक हथियारों के निर्यात पर लगे कड़े प्रतिबंध को हटा दिया गया है, जिससे जापान वैश्विक हथियार बाजार में खुलकर उतरने जा रहा है।यह बड़ा फैसला प्रधानमंत्री साने ताकाइची की कैबिनेट ने मंगलवार को लिया।

नए दिशा-निर्देशों को मंजूरी मिलते ही जापान द्वारा विकसित युद्धपोत, लड़ाकू ड्रोन, मिसाइल और अन्य उन्नत हथियारों की बिक्री का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। इसे देश के रक्षा उद्योग को मजबूत करने की दिशा में निर्णायक कदम माना जा रहा है। सरकार का कहना है कि यह बदलाव तेजी से बदलते सुरक्षा हालात को देखते हुए जरूरी था। मुख्य कैबिनेट सचिव मिनोरु किहारा ने कहा कि नई नीति जापान की सुरक्षा को मजबूत करेगी और क्षेत्रीय व वैश्विक स्थिरता में योगदान देगी। दरअसल, चीन और उत्तर कोरिया की बढ़ती आक्रामकता ने जापान को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर किया है।

हालांकि इस फैसले को लेकर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया बंटी हुई है। चीन ने इस कदम की कड़ी आलोचना की है, जबकि ऑस्ट्रेलिया जैसे रक्षा साझेदारों ने इसका स्वागत किया है। दक्षिण-पूर्व एशिया और यूरोप के कई देशों ने भी जापानी हथियारों में रुचि दिखाई है, जिससे वैश्विक हथियार बाजार में नई प्रतिस्पर्धा देखने को मिल सकती है। गौरतलब है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बने जापान के शांतिवादी संविधान के तहत दशकों तक हथियार निर्यात पर लगभग पूर्ण प्रतिबंध रहा। हालांकि हाल के वर्षों में बढ़ते वैश्विक तनाव के कारण इसमें सीमित ढील दी गई थी, जिसमें केवल बचाव, परिवहन, निगरानी और बारूदी सुरंग हटाने जैसे क्षेत्रों तक निर्यात की अनुमति थी।

अब नए नियमों के तहत लड़ाकू विमान, युद्धपोत और मिसाइल जैसे घातक हथियारों के निर्यात को भी मंजूरी मिल गई है। फिलहाल यह निर्यात केवल उन 17 देशों तक सीमित रहेगा, जिनके साथ जापान के रक्षा तकनीक हस्तांतरण समझौते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम जहां जापान की सुरक्षा और आर्थिक ताकत को बढ़ाएगा, वहीं वैश्विक स्तर पर तनाव और हथियारों की होड़ को भी तेज कर सकता है।
















