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सूख गई जीवनदायिनी: अप्रैल में ही बेपानी हुई सोना नदी, अस्तित्व पर गहराया संकट

पटना, 15 अप्रैल (सेंट्रल डेस्क) सीमावर्ती यूपी से निकलने वाली सोना नदी इन दिनों अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। कभी सालों भर लबालब रहने वाली यह नदी अब अप्रैल महीने में ही पूरी तरह सूख गई है। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कई जगहों पर नदी और खेत के बीच का फर्क तक मिट गया है। वर्षों से तलहटी की सफाई नहीं होने, बढ़ते अतिक्रमण और प्रशासनिक लापरवाही ने इस नदी को मौत के मुहाने पर पहुंचा दिया है।

Yann Forget, CC-BY-SA

पंचदेवरी, कटेया और भोरे प्रखंडों से होकर गुजरने वाली यह नदी, जो गंडक की सहायक मानी जाती है, कभी इलाके की जीवनरेखा थी। इसी नदी के पानी से लोग पीने, नहाने, मवेशियों को पानी पिलाने और खेतों की सिंचाई का काम करते थे। लेकिन आज हालात यह हैं कि इसका पानी गंदगी और प्रदूषण के कारण पूरी तरह अनुपयोगी हो चुका है। एक समय था जब सोना नदी के जलग्रहण क्षेत्र में धान, गेहूं और गन्ने की बंपर पैदावार होती थी। किसान नदी के पानी पर ही निर्भर रहते थे और सिंचाई के लिए जगह-जगह घाट बनाए गए थे।

लेकिन समय के साथ नदी में गाद और शिल्ट जमा होती गई, जिससे इसकी गहराई और जलधारण क्षमता घटती चली गई। नतीजतन, अब गर्मी की शुरुआत में ही नदी सूख जा रही है और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह नदी यूपी से निकलकर पंचदेवरी में जिले में प्रवेश करती है, फिर कटेया होते हुए भोरे प्रखंड से गुजरती है और अंत में घुरनाकुंड में संगम स्थल पर समाप्त होती है। घुरनाकुंड आज भी लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहां हर साल हजारों श्रद्धालु स्नान करने पहुंचते हैं। नदी की इस दुर्दशा के पीछे सबसे बड़ा कारण प्रशासनिक उदासीनता और बढ़ता अतिक्रमण है।

नदी की चौड़ाई लगातार सिमट रही है और इसके जल स्रोतों खांड़, पईन आदि पर भी अवैध कब्जा हो चुका है, जिससे जल प्रवाह लगभग ठप हो गया है। हालांकि सरकार की जल-जीवन-हरियाली योजना और मनरेगा के तहत नदियों के जीर्णोद्धार की बात कही जा रही है, लेकिन सोना नदी के मामले में अभी तक जमीनी स्तर पर कोई ठोस पहल नजर नहीं आ रही है। ऐसे में लोगों की उम्मीदें फिलहाल अधर में लटकी हुई हैं।

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