कोलकाता, 11 अप्रैल (कोलकाता डेस्क) पश्चिम बंगाल की सियासत में कांग्रेस ने दशकों बाद बड़ा राजनीतिक जोखिम उठाते हुए खुद को फिर से विकल्प के तौर पर पेश किया है। करीब 30 वर्षों बाद पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन जमीनी हकीकत उसकी रणनीति पर सवाल खड़े कर रही है। कई इलाकों में उम्मीदवार तो घोषित हो गए हैं, मगर चुनावी वादों को जनता तक पहुंचाने के लिए कार्यकर्ताओं की भारी कमी सामने आ रही है।

दरअसल, जिन सीटों पर लंबे समय से वामदल और तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व रहा है, वहां कांग्रेस पहली बार मजबूती से उतर रही है। 2021 के विधानसभा चुनाव में महज 3 फीसदी वोट शेयर के साथ खाता तक नहीं खोल पाने वाली कांग्रेस इस बार बेहद सावधानी से कदम बढ़ा रही है। पार्टी का मुख्य फोकस अपने पारंपरिक गढ़ मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तरी दिनाजपुर पर है। बहरामपुर सीट से वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी को मैदान में उतारा गया है, जबकि मालदा की मालतीपुर सीट से मौसम नूर को टिकट दिया गया है।

कांग्रेस को उम्मीद है कि सभी सीटों पर चुनाव लड़ने से उसका वोट प्रतिशत बढ़ेगा और संगठन को पुनर्जीवित करने का मौका मिलेगा। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी कुछ सीटें जीतकर ही अपने पुनर्गठन की शुरुआत कर सकती है।उधर, शीर्ष नेतृत्व मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के प्रचार कार्यक्रम को अंतिम रूप दिया जा रहा है। खास बात यह है कि राहुल गांधी ने 2021 और 2024 में बंगाल में प्रचार नहीं किया था।राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए कांग्रेस संतुलन साधने की कोशिश में है। ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा है, ऐसे में कांग्रेस नहीं चाहती कि उसकी मौजूदगी से सहयोगी दल को नुकसान पहुंचे। बंगाल में भाजपा और तृणमूल के बीच बढ़ती सीधी टक्कर के बीच कांग्रेस का यह दांव कितना कारगर होगा, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।

















