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आईना-ए-ज़िंदगी

आज के साहित्यिक अंगना में राजस्थान, जोधपुर की सुप्रसिद्ध कवयित्री मधुबाला श्रीवास्तव जी की ग़ज़ल

उठ रहीं चिंगारियाँ हैं आतिशों के मोड़ पर
लग रहा हम आ गए हैं दुश्मनों के मोड़ पर

ज़ख़्म गहरे हो गए फिर ,ये मुदावा किस लिए
क्या करेंगी अब दवाएँ इन ग़मों के मोड़ पर

रास्तो ! हमसे न पूछो तुम हमारा हौसला
ये क़दम रुकते नहीं हैं मुश्किलों के मोड़ पर

हाकिमों के फ़ैसलों से मुद्दई ‌ हैरान हैं
उलझे कितने हैं मसाइल फ़ैसलों के मोड़ पर

बेईमानी, बद-अमाली में धँसे हैं पाँव यूँ
जैसे दुनिया आ गई हो दलदलों के मोड़ पर

बेबसी की धूप में झुलसी हुई हैं सूरतें
यूँ निशाँ बाक़ी हैं अब तक हर ग़मों के मोड़ पर

हर क़दम पर ले रही है इम्तिहाँ ये ज़िन्दगी
मत ठहरना हारकर तुम आफ़तों के मोड़ पर

मुद्दतों से ही सवालों में है उलझी ज़िन्दगी
जाने कब पहुँचेंगे हम इनके हलों के मोड़ पर

फ़लसफ़े सब झूठे लगते हैं जहाँ में अब ‘मधुर’
इसलिए ख़ामोश हैं लब फ़लसफ़ों के मोड़ पर

~डॉ मधुबाला श्रीवास्तव

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