नई दिल्ली, 11 अप्रैल (अशोक “अश्क”) पश्चिम एशिया में भले ही युद्ध की आग फिलहाल धीमी पड़ी हो, लेकिन ऊर्जा संकट का खतरा अब भी टला नहीं है। इसी बीच Oil and Natural Gas Corporation के चेयरमैन और सीईओ अरुण कुमार सिंह ने देश को गंभीर चेतावनी दी है “तेल और गैस की हर बूंद अब कीमती है। ”दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने साफ कहा कि भारत को अब यह मान लेना चाहिए कि खाड़ी देशों से ऊर्जा की आसान आपूर्ति का दौर खत्म हो रहा है।

पिछले दो महीनों से Strait of Hormuz लगभग बंद जैसी स्थिति में है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ा है। दुनिया के करीब 20% तेल और गैस की सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है, और भारत इस पर सबसे ज्यादा निर्भर देशों में शामिल है। आंकड़े स्थिति की गंभीरता बयां करते हैं—भारत अपने कच्चे तेल का 88% आयात करता है, जिसमें 40% होर्मुज के रास्ते आता है। प्राकृतिक गैस के मामले में 50% आयात निर्भरता है, जिसमें 55-60% एलएनजी इसी मार्ग से गुजरता है। वहीं, एलपीजी का 60% आयात होता है, जिसमें 90% सप्लाई होर्मुज से जुड़ी है।

सिंह ने कहा कि अगर पहले इस तरह के संकट की आशंका होती, तो कतर जैसे देशों में इतना बड़ा निवेश शायद नहीं किया जाता। उन्होंने चेताया कि पश्चिम एशिया में वैचारिक और आंतरिक विभाजन इतने गहरे हैं कि ऐसे संकट बार-बार सामने आ सकते हैं। उन्होंने आधुनिक युद्ध तकनीकों ड्रोन और मिसाइलों का जिक्र करते हुए कहा कि रिफाइनरियों को आसानी से निशाना बनाया जा सकता है, जिससे सप्लाई पूरी तरह ठप हो सकती है।इस चुनौती से निपटने के लिए ONGC प्रमुख ने तीन बड़े सुझाव दिए—देश के भीतर तेल-गैस उत्पादन बढ़ाना, आपातकालीन भंडार मजबूत करना और मिडिल ईस्ट पर निर्भरता घटाकर वैकल्पिक स्रोत तलाशना।ऊर्जा संकट का असर अब दिखने भी लगा है। आपूर्ति बाधित होने के कारण कुछ उद्योगों के लिए गैस और एलपीजी में कटौती करनी पड़ी है, ताकि घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता दी जा सके। सरकार अब गहरे समुद्र में खोज और वैकल्पिक ऊर्जा विकल्पों पर तेजी से काम कर रही है।

















