नई दिल्ली, 01 अप्रैल (अशोक “अश्क”) मध्य प्रदेश के बहुचर्चित भोजशाला विवाद में मुस्लिम पक्ष को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए साफ कहा कि इस स्तर पर हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है और सभी पक्षों को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का रुख करना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान भरोसा जताया कि हाईकोर्ट सभी आपत्तियों पर कानून और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत निष्पक्ष निर्णय करेगा।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है। मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने जोरदार दलीलें पेश करते हुए हाईकोर्ट में 2 अप्रैल से प्रस्तावित सुनवाई टालने और सर्वेक्षण की वीडियोग्राफी व रंगीन तस्वीरें उपलब्ध कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट पर जवाब देने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया और प्रक्रिया में जल्दबाजी हो रही है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि हाईकोर्ट वीडियोग्राफी सहित सभी साक्ष्यों का अवलोकन करेगा और दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलेगा।

न्यायमूर्ति जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने भी संकेत दिया कि अदालत में वीडियोग्राफी चलाई जाएगी, जहां सभी पक्ष उसकी सत्यता को चुनौती दे सकेंगे। यह याचिका मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी की ओर से दायर की गई थी, जिसमें हाईकोर्ट के 16 मार्च के आदेश को चुनौती दी गई थी। उस आदेश में विवादित स्थल के सर्वे और निरीक्षण की अनुमति दी गई थी।वहीं, हिंदू पक्ष की ओर से वकील विष्णु जैन ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने किसी मांग को खारिज नहीं किया है, बल्कि अंतिम सुनवाई में सभी आपत्तियों पर विचार करने की बात कही है। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि हाईकोर्ट उसके पूर्व आदेशों का सम्मान करते हुए पारदर्शी प्रक्रिया अपना रहा है। अब इस संवेदनशील विवाद की अगली सुनवाई हाईकोर्ट में होगी, जहां सभी साक्ष्यों और दलीलों के आधार पर फैसला तय करेगा कि भोजशाला का भविष्य क्या होगा।
















