Image

फिर मैं मुस्कुराना चाहती हूं

आज साहित्यिक आंगन गीत गुंजन में उत्तर प्रदेश, अयोध्या की युवा कवयित्री ऋचा श्रीवास्तव जी की एक ग़ज़ल

जिंदगी आगे बढ़ाना चाहती हूं।

आज खुद को आजमाना चाहती हूं।

रब मुझे जो दे सजा मंजूर है सब,

खुल के फिर मैं मुस्कुराना चाहती हूं।

प्यार की जंजीर में वो बांध ले अब,

बाजुओं में कैद होना चाहती हूं।

उसकी आंखों का नशा ऐसा हुआ है,

उसमें ही मैं डूब जाना चाहती हूं

नाम उसके कर दुं सारी जिंदगी मैं,

ऐसा ही कोई बहाना चाहती हूं।

भीग जांऊ प्यार के बरसात में बस,

साथ में उसको भिगाना चाहती हूं।

सुन सके मेरा तराना हर कोई अब,

ऐसा कोई गीत गाना चाहती हूं।

बस मुहब्बत खेल बनकर रह गई है,

हर किसी को ये बताना चाहती हूं

। ~ ऋचा श्रीवास्तव

Releated Posts

भारत की नारियाँ

आज साहित्यिक आँगन गीत गुंजन में राष्ट्रीय राजधानी, नई दिल्ली से सुप्रसिद्ध कवयित्री अंशु विनोद गुप्ता जी की…

नशे में नशा कर रहे हो

आज साहित्यिक आँगन गीत गुंजन में बिहार, समस्तीपुर से सुप्रसिद्ध कवि प्रवीण कुमार ‘चुन्नू’ जी की एक ग़ज़ल…

रात दिन रहता है तेरी याद का दफ्तर खुला

आज साहित्यिक आँगन गीत गुंजन में पश्चिम बंग, आसनसोल से सुप्रसिद्ध शायरा ग़़ज़ाला तबस्सुम जी की एक ग़ज़ल…

पापा

आज साहित्यिक आँगन गीत गुंजन में बिहार, बेगूसराय से सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ सुनीता ‘सुमन’ जी की एक कविता…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top