आज साहित्यिक आँगन गीत गुंजन में यू. एस., न्यू जर्सी से सुप्रसिद्ध कवयित्री कविता सिंह “वफ़ा” जी की एक ग़ज़ल

चाहे मिल जाएँ माल-ओ -ज़र तुमको !
क़द्र रिश्तों की हो मगर तुमको !!
तर्क-ए-ताल्लुक़ के बाद भी अब तक,
ढूँढ़ती है मेरी नज़र तुमको!
सरे मंज़िल जुदा हुए हो जो ,
याद आएगा ये सफ़र तुमको!
बस ये किरदार पाक-साफ़ रहे,
लोग समझेंगे मोतबर तुमको!
आब-ओ-दाना न मुस्तकिल हो गर,
जीस्त रक्खेगी दर-बदर तुमको!
तुम शनावर अगरचे माहिर हो,
मिल ही जाएँगे फिर गुहर तुमको!
जान-ओ-दिल दे दिए तुम्हें ऐ ‘वफ़ा’,
कौन चाहेगा इस क़दर तुमको!
~ कविता सिंह “वफ़ा”
















