नई दिल्ली, 11 अप्रैल (अशोक “अश्क”) देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) व्यवस्था को लेकर बड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है। उन्होंने आगाह किया कि अगर अदालतें जरूरत से ज्यादा दखल देंगी, तो विवाद निपटारे की इस अहम प्रणाली पर से भरोसा कमजोर पड़ सकता है। शुक्रवार को Indian Council of Arbitration की इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस के पांचवें सत्र में उद्घाटन भाषण देते हुए उन्होंने न्यायपालिका को संयम बरतने की नसीहत दी। सीजेआई ने कहा कि मध्यस्थता केवल एक वैकल्पिक व्यवस्था नहीं, बल्कि आज के वैश्विक आर्थिक ढांचे में एक “पसंदीदा मार्ग” बन चुकी है।

ऐसे में अदालतों को इसकी कार्यवाही और फैसलों में हस्तक्षेप करते समय बेहद सतर्क रहना चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अत्यधिक न्यायिक दखलंदाजी से मध्यस्थता के तहत हुए समझौतों के प्रति विश्वास डगमगा सकता है। अपने संबोधन में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मध्यस्थता के खिलाफ निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) का इस्तेमाल सिर्फ असाधारण परिस्थितियों में ही होना चाहिए, जैसे किसी फैसले की गंभीर समीक्षा की स्थिति में। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस व्यवस्था की स्वायत्तता बनाए रखना बेहद जरूरी है, ताकि यह प्रभावी और विश्वसनीय बनी रहे।

सीजेआई सूर्यकांत ने मध्यस्थता को “विवाद समाधान का एक्सप्रेस हाईवे” बताते हुए कहा कि कारोबारी दुनिया में तेजी, स्पष्टता और पूर्वानुमान बेहद अहम होते हैं। खासकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार में, जहां विभिन्न देशों के बीच लेनदेन होता है, वहां एक निष्पक्ष और लागू करने योग्य तंत्र की आवश्यकता और बढ़ जाती है। तकनीक के बढ़ते प्रभाव पर भी उन्होंने प्रकाश डाला। उनके अनुसार, लीगल टेक्नोलॉजी ने मध्यस्थता को और अधिक सशक्त और सुलभ बनाया है। इससे न केवल प्रक्रिया तेज हुई है, बल्कि पारदर्शिता और भरोसा भी बढ़ा है। यह महत्वपूर्ण सम्मेलन Delhi High Court में आयोजित किया गया, जिसका विषय था “ग्लोबलाइजेशन के दौर में आर्बिट्रेशन: लीगल टेक्नोलॉजी, आर्थिक विकास और क्रॉस-बॉर्डर विवाद।”सीजेआई के इस बयान को न्यायिक और कारोबारी हलकों में दूरगामी प्रभाव वाला माना जा रहा है, जो आने वाले समय में भारत की मध्यस्थता नीति की दिशा तय कर सकता है।
















