नई दिल्ली, 06 अप्रैल (अशोक “अश्क”) आने वाला साल भारतीय रेलवे और यात्रियों के लिए ऐतिहासिक साबित हो सकता है। देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। रेलवे सूत्रों के मुताबिक, इस अत्याधुनिक ट्रेन के साथ उसका फ्यूल स्टेशन भी लगभग तैयार है, जबकि सुरक्षा मानकों की गहन जांच जारी है। इसी क्रम में हरियाणा के जींद और सोनीपत के बीच इस ट्रेन का पहला सफल ट्रायल भी पूरा कर लिया गया है, जिसमें ट्रेन ने 85 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हासिल कर नई उम्मीदें जगा दी है।

रेलवे अधिकारियों का कहना है कि इस ट्रायल से मिले डेटा के आधार पर तकनीकी खामियों का विश्लेषण किया जाएगा। इसके बाद कई और परीक्षण किए जाएंगे, ताकि सभी अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने के बाद इसे नियमित संचालन की मंजूरी मिल सके। जानकारी के अनुसार, चेन्नई में तैयार की गई इस हाइड्रोजन ट्रेन में कुल 10 कोच होंगे, जिनमें 8 यात्री कोच शामिल हैं। प्रत्येक कोच में लगभग 100 यात्री बैठ सकेंगे। बढ़ते प्रदूषण के बीच यह ट्रेन पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है। यह पूरी तरह ‘जीरो कार्बन इमिशन’ पर आधारित होगी, यानी इससे किसी भी प्रकार का धुआं या प्रदूषण नहीं होगा।

रेलवे का दावा है कि यह दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन ट्रेन होगी, जबकि जर्मनी में शुरू हुई ऐसी ट्रेन केवल दो कोच की थी।तकनीकी रूप से भी यह ट्रेन बेहद शक्तिशाली है। इसमें कुल 2,400 किलोवाट क्षमता होगी और दो ड्राइविंग पावर कार लगाई गई हैं, जिनकी क्षमता 1,200-1,200 किलोवाट है। इसकी अधिकतम रफ्तार 105 किलोमीटर प्रति घंटा होगी और यह एक दिन में करीब 360 किलोमीटर की दूरी तय कर सकेगी। जींद में इसके लिए विशेष हाइड्रोजन प्लांट स्थापित किया गया है, जहां इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया के जरिए ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन होगा। रेलवे के इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट से न केवल यात्रा में क्रांति आएगी, बल्कि भारत वैश्विक स्तर पर हरित तकनीक के क्षेत्र में नई पहचान भी बनाएगा।















