समस्तीपुर, 03 अक्टूबर (मोहम्मद जमशेद) डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू), पूसा के दो अधिकारियों के खिलाफ चल रही विभागीय कार्रवाई को पटना हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति हरीश कुमार की अदालत ने स्पष्ट किया कि विभागीय कार्रवाई शुरू करने की मंजूरी और आरोप-पत्र यानी चार्ज मेमो जारी करने की मंजूरी अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। चार्ज मेमो जारी करने से पहले सक्षम अनुशासनिक प्राधिकारी की आवश्यक मंजूरी लेना अनिवार्य है। नियमों का पालन नहीं होने पर अदालत ने 2 फरवरी 2026 को प्रस्तुत जांच रिपोर्ट समेत कार्रवाई की आगे की कार्यवाही भी निरस्त कर दी।

मामला आरपीसीएयू में प्रतिनियुक्ति पर डिप्टी रजिस्ट्रार के पद पर कार्यरत महेश हुड्डा और डॉ. रमेश कुमार पाठक से जुड़ा है। दोनों अधिकारियों ने अलग-अलग सिविल रिट याचिकाएं दायर कर उनके खिलाफ शुरू की गई विभागीय कार्रवाई को चुनौती दी थी। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाएं स्वीकार करते हुए संबंधित चार्ज मेमो और जांच रिपोर्ट को भी टिकाऊ नहीं माना। 2023 में शुरू हुई थी कार्रवाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, विश्वविद्यालय में प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित शिकायतों के बाद कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के माध्यम से जांच कराई गई थी।

इसके बाद आरपीसीएयू में तीन सदस्यीय आंतरिक समिति गठित की गई। समिति की रिपोर्ट 6 दिसंबर 2023 को बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट की 21वीं बैठक में एजेंडा संख्या 21.8 के तहत रखी गई। बोर्ड ने दोनों अधिकारियों के खिलाफ केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1965 के नियम 14 के तहत विभागीय कार्रवाई शुरू करने का निर्णय लिया।बोर्ड ने कुलपति को चार्जशीट जारी करने, जांच अधिकारी और प्रस्तुतिकरण अधिकारी नियुक्त करने तथा जांच से संबंधित रोजमर्रा के निर्णय लेने के लिए अधिकृत किया था। इसके बाद मुख्य सतर्कता अधिकारी ने 2 अप्रैल 2025 को दोनों अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई का मेमोरेंडम जारी किया। जांच पूरी होने पर जांच अधिकारी ने 2 फरवरी 2026 को रिपोर्ट सौंपी, जिसमें आरोपों को स्थापित माना गया था।

मंजूरी के सवाल पर कोर्ट का बड़ा फैसलामामले में मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट की मंजूरी ही चार्ज मेमो जारी करने के लिए पर्याप्त थी। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Union of India vs. B.V. Gopinath, State of Tamil Nadu vs. Pramod Kumar और Sunny Abraham vs. Union of India समेत संबंधित फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि दोनों मंजूरियां अलग प्रक्रियाएं हैं। अदालत ने रिकॉर्ड और विश्वविद्यालय के हलफनामे के आधार पर पाया कि चार्ज मेमो जारी करते समय आवश्यक मंजूरी नहीं ली गई थी। इससे CCS (CCA) Rules, 1965 के Rule 14(3)(b) में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ।नए सिरे से कार्रवाई की छूटहाईकोर्ट ने आवश्यक मंजूरी के अभाव में आगे की कार्यवाही, चार्ज मेमो और जांच रिपोर्ट निरस्त कर दी। हालांकि, अदालत ने अनुशासनिक प्राधिकारी को कानून के अनुरूप आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने के बाद दोनों अधिकारियों के खिलाफ नए सिरे से चार्ज मेमो जारी करने की स्वतंत्रता दी है।














