नई दिल्ली, 03 अप्रैल (अशोक “अश्क”) वैश्विक रणनीति के नए दौर में भारत ने अफ्रीकी देशों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने के लिए बड़ा कूटनीतिक दांव चला है। हाल के दिनों में भारत द्वारा बुर्किना फासो, मलावी और मोजाम्बिक जैसे देशों को बड़े पैमाने पर खाद्य सहायता भेजे जाने को केवल मानवीय पहल नहीं, बल्कि दुर्लभ खनिजों की दौड़ में रणनीतिक कदम के तौर पर देखा जा रहा है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पुष्टि करते हुए बताया कि भारत ने बुर्किना फासो को 1,000 मीट्रिक टन चावल भेजा है, जो वहां के विस्थापित और कमजोर वर्गों के लिए राहत का बड़ा सहारा बनेगा। इससे पहले मार्च में सूखे की मार झेल रहे मलावी को भी इतनी ही मात्रा में चावल भेजा गया था, जहां करीब 40 लाख लोग खाद्य संकट से जूझ रहे हैं। वहीं मोजाम्बिक में आई भीषण बाढ़ के बाद भारत ने 500 मीट्रिक टन चावल के साथ तंबू, दवाइयां और स्वच्छता किट भी भेजकर मदद पहुंचाई।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह सक्रियता ऐसे समय में बढ़ी है, जब अफ्रीका के कई देशों में सोना, मैंगनीज, जिंक और लिथियम जैसे दुर्लभ खनिजों के विशाल भंडार मिलने की खबरें सामने आ रही हैं। खासकर बुर्किना फासो, जो पहले से सोने की खदानों के लिए प्रसिद्ध है, अब ग्रीन एनर्जी के लिए जरूरी खनिजों का केंद्र बनता जा रहा है। वैश्विक परिदृश्य में चीन और अमेरिका पहले से ही इन संसाधनों पर पकड़ बनाने की होड़ में हैं। चीन जहां बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश कर खनन अधिकार हासिल कर रहा है, वहीं अमेरिका ‘खनिज सुरक्षा साझेदारी’ के जरिए अपनी आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करने में जुटा है। ऐसे में भारत की ‘मानवीय सहायता कूटनीति’ एक अलग मॉडल पेश कर रही है। भारत सीधे नागरिक स्तर पर संबंध मजबूत करने, तकनीकी सहयोग और क्षमता निर्माण पर जोर दे रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार यह रणनीति दीर्घकालिक आर्थिक हितों को साधने में कारगर साबित हो सकती है।हालिया शोध पत्रों में भी सुझाव दिया गया है कि भारत को अफ्रीका में मूल्य-आधारित खनिज कूटनीति को आगे बढ़ाना चाहिए, ताकि वैश्विक ऊर्जा संकट और आपूर्ति बाधाओं से निपटा जा सके। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में बढ़ते जोखिम ने इस आवश्यकता को और भी स्पष्ट कर दिया है। भारत का लक्ष्य स्पष्ट है—अफ्रीकी देशों के साथ भरोसेमंद साझेदारी बनाकर न केवल मानवीय सहायता देना, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ और इलेक्ट्रिक वाहन नीति के लिए जरूरी खनिजों की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करना। इस कूटनीतिक पहल ने वैश्विक शक्तियों के बीच नई प्रतिस्पर्धा को जन्म दे दिया है, जिससे आने वाले समय में अफ्रीका अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बन सकता है।

















