नई दिल्ली, 17 जून (अशोक “अश्क”) फ्रांस में चल रहे G7 शिखर सम्मेलन से भारत के लिए एक बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आई है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने एक बार फिर रूस-यूक्रेन युद्ध को अपने एजेंडे में शीर्ष प्राथमिकता पर ला दिया है। इसके साथ ही रूस के तेल कारोबार पर दोबारा कड़े प्रतिबंध लगाने की तैयारी शुरू हो गई है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और सस्ते रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखने के लिए रूस को दी गई अस्थायी छूट अब समाप्त की जा सकती है। ट्रंप ने कहा कि खाड़ी क्षेत्र में लंबे समय से जारी तनाव कम होने और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से तेल आपूर्ति सामान्य होने के बाद रूस पर फिर से आर्थिक दबाव बढ़ाने का समय आ गया है।

उनके अनुसार अब तेल आपूर्ति की स्थिति पहले की तुलना में बेहतर है, इसलिए प्रतिबंधों को दोबारा लागू करने की संभावना बढ़ गई है।G7 देशों के बीच रूस की ऊर्जा आय को सीमित करने पर व्यापक सहमति बनती दिखाई दे रही है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने रूस के तथाकथित “शैडो फ्लीट” यानी गुप्त तेल टैंकर नेटवर्क और उससे जुड़े वित्तीय तंत्र पर नए प्रतिबंधों की घोषणा भी कर दी है। इससे रूस के तेल निर्यात को बड़ा झटका लग सकता है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है और पिछले कई महीनों से रियायती दरों पर रूसी तेल का प्रमुख खरीदार बना हुआ है। ईरान युद्ध के दौरान वैश्विक बाजार में तेल कीमतों में भारी उछाल आया था, जिसके बाद अमेरिका ने भारत समेत कुछ देशों को रूसी तेल खरीदने पर अस्थायी राहत दी थी।

हालांकि यह राहत 17 जून को समाप्त हो रही है। यदि इसे आगे नहीं बढ़ाया गया तो भारतीय रिफाइनरियों के लिए रूस से तेल आयात करना अधिक जटिल और जोखिमपूर्ण हो सकता है। G7 सम्मेलन में मौजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की। वहीं यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की ने रूस पर और कड़े प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए कहा कि मॉस्को को बातचीत की मेज पर लाने का यही एक प्रभावी तरीका है। यूरोपीय शोध संस्था सीआरईए की रिपोर्ट के अनुसार मई 2026 में भारत रूस से जीवाश्म ईंधन खरीदने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश रहा। रूस से भारत का कुल आयात बढ़कर 5.8 अरब यूरो तक पहुंच गया। ऐसे में यदि नए प्रतिबंध लागू होते हैं तो भारत के सामने ऊर्जा जरूरतों और वैश्विक कूटनीतिक दबावों के बीच संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी रुख में बदलाव से वैश्विक तेल बाजार में फिर उथल-पुथल मच सकती है।
















