मुजफ्फरपुर, 06 जून (संतोष गुप्ता) बिहार की शान और देश-दुनिया में मशहूर मुजफ्फरपुर की लीची एक ओर जहां नई तकनीक और उत्पादों के जरिए वैश्विक बाजार में अपनी पहचान मजबूत कर रही है, वहीं दूसरी ओर लीची स्टिंक बग कीट नई चुनौती बनकर उभरा है। मीनापुर क्षेत्र में करीब 700 एकड़ लीची बागान इस कीट के प्रकोप से प्रभावित हुआ है। इसके नियंत्रण के लिए सामूहिक रोकथाम अभियान चलाया जा रहा है। वर्ष 2001 में स्थापित राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केन्द्र ने अपने 26 वर्षों के सफर में लीची किसानों के लिए कई उपलब्धियां हासिल की हैं। केन्द्र ने लीची की शेल्फ लाइफ बढ़ाने से लेकर नई लेट वैरायटी और मूल्य संवर्धित उत्पाद विकसित किए हैं।

वैज्ञानिक अंकित कुमार और उनकी टीम ने “लीचीमिश” नामक नया उत्पाद तैयार किया है। लीची के पल्प, चीनी और साइट्रिक एसिड से तैयार यह उत्पाद किशमिश की तरह है और इसकी शेल्फ लाइफ एक वर्ष तक रहती है। इसके अलावा लीची शहद, लीचीगुल्ला और अन्य उत्पाद भी विकसित किए गए हैं। केन्द्र के निदेशक डॉ. बिकास दास ने बताया कि मॉडिफाइड एटमॉस्फियर पैकेजिंग तकनीक के सफल प्रयोग से अब लीची सामान्य तापमान पर पांच दिनों तक ताजा रह सकेगी। पहले इसकी शेल्फ लाइफ महज दो दिन थी। इस तकनीक से बिना कोल्ड चेन के लीची को सड़क मार्ग से दिल्ली तक सुरक्षित भेजने में सफलता मिली है।

किसानों के लिए एक और खुशखबरी यह है कि संस्थान ने गंडकी संपदा, गंडकी योगिता और गंडकी लालिमा नामक तीन नई लेट वैरायटी विकसित की हैं। ये किस्में जुलाई के मध्य तक बाजार में उपलब्ध रहेंगी, जिससे किसानों को लंबे समय तक उत्पादन और बेहतर आमदनी का अवसर मिलेगा। देश में लीची का रकबा 55 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 99 हजार हेक्टेयर और उत्पादन 2.5 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर लगभग 7 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच चुका है।

















