पटना, 02 जून (पटना डेस्क) खरीफ फसल की तैयारियों के बीच प्रखंड क्षेत्र के किसानों के सामने डीएपी (डाय-अमोनियम फास्फेट) खाद की किल्लत गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। एक ओर किसान धान की नर्सरी तैयार करने और खेतों की जुताई में जुटे हैं, वहीं दूसरी ओर बाजार में डीएपी की कमी ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। यदि जल्द ही पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध नहीं हुई तो इस वर्ष धान उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। परंपरा के अनुसार किसान रोहिणी और मृगशिरा नक्षत्र के दौरान धान का बिचड़ा गिराते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए किसान समय पर नर्सरी तैयार करने में जुटे हुए हैं।

धान की नर्सरी तैयार करने में डीएपी खाद की अहम भूमिका होती है। इसके उपयोग से पौधों का विकास बेहतर होता है तथा पौधे मजबूत और स्वस्थ बनते हैं। यही वजह है कि खरीफ सीजन शुरू होते ही किसान डीएपी की खरीदारी कर उसका भंडारण करने लगते हैं।हालांकि इस बार बाजार में डीएपी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। खाद दुकानदार किसानों को एनपीके और एसएसपी जैसे वैकल्पिक उर्वरकों के उपयोग की सलाह दे रहे हैं, लेकिन अधिकांश किसान डीएपी को ही अधिक प्रभावी मानते हैं। किसानों का कहना है कि धान की अच्छी पैदावार के लिए डीएपी सबसे महत्वपूर्ण उर्वरकों में शामिल है।

जानकारी के अनुसार पिछले वर्ष सूर्यगढ़ा प्रखंड में धान आच्छादन का लक्ष्य करीब 10,600 हेक्टेयर निर्धारित किया गया था। इस वर्ष अभी तक लक्ष्य तय नहीं हुआ है, लेकिन किसानों ने खेती की तैयारियां शुरू कर दी हैं। ऐसे में खाद संकट ने उनकी चिंता और बढ़ा दी है।गरीबनगर गांव के किसान रंजीत कुमार ने बताया कि यदि डीएपी की कमी लंबे समय तक बनी रही तो धान की पैदावार प्रभावित होगी। इससे किसानों की आय घटेगी और आर्थिक स्थिति पर भी असर पड़ेगा। बढ़ती खेती लागत के बीच उत्पादन में कमी किसानों के लिए दोहरी मार साबित हो सकती है। उधर खाद विक्रेताओं का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं के कारण रासायनिक उर्वरकों की उपलब्धता प्रभावित हुई है। उनका मानना है कि यदि जल्द आपूर्ति सामान्य नहीं हुई तो कृषि क्षेत्र के साथ-साथ किसानों की आजीविका पर भी संकट गहरा सकता है।

















