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25 साल में टूटा विक्रमशिला पुल: 60 साल बाद भी अडिग कोसी का पुल, बिहार के नव निर्मित पुलों पर उठे बड़े सवाल

पटना, 08 मई (पटना डेस्क) विक्रमशिला सेतु के एक हिस्से के ध्वस्त होने के बाद बिहार में पुल निर्माण की गुणवत्ता और इंजीनियरिंग मानकों को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। एक ओर करीब 25 साल पुराना विक्रमशिला सेतु क्षतिग्रस्त हो गया, वहीं दूसरी ओर 1960 के दशक में बना कोसी पुल आज भी भारी वाहनों का दबाव झेलते हुए मजबूती से खड़ा है। इस तुलना ने आम लोगों से लेकर इंजीनियरिंग विशेषज्ञों तक को सोचने पर मजबूर कर दिया है। लोगों के बीच अब यह चर्चा तेज हो गई है कि आधुनिक तकनीक, भारी बजट और उन्नत मशीनरी के बावजूद नए पुल अपेक्षित मजबूती क्यों नहीं दिखा पा रहे हैं।

वहीं सीमित संसाधनों और पुराने दौर की तकनीक से बने पुल आज भी उपयोगी साबित हो रहे हैं। कई लोग निर्माण गुणवत्ता, निगरानी प्रणाली और भ्रष्टाचार को इसके पीछे बड़ी वजह मान रहे हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि पुराने समय में पुलों का निर्माण लंबी अवधि और भारी दबाव को ध्यान में रखकर किया जाता था। हालांकि उस दौर में ट्रकों की क्षमता 10 से 12 टन तक होती थी, लेकिन आज 50 से 55 टन तक के भारी वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं। इसके बावजूद कुरसेला का कोसी पुल लगातार वाहनों का भार सहन कर रहा है। यह पुल राष्ट्रीय राजमार्ग 31 पर स्थित है, जो पूर्वोत्तर भारत को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है।

गुवाहाटी समेत कई राज्यों के लिए यह लाइफलाइन की तरह काम करता है। लगातार भारी ट्रैफिक के बावजूद पुल का संचालन जारी रहना इसकी मजबूती को दर्शाता है। हालांकि वर्ष 2019 में पुल के एक पिलर के धंसने की घटना के बाद इसकी स्थिति को लेकर चिंता जरूर बढ़ी थी। इसके बाद भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा नियमित मरम्मत और निगरानी का काम किया गया, जिससे पुल को सुरक्षित बनाए रखा जा सका। बताया जाता है कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान सेना की रसद आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए इस पुल का निर्माण कराया गया था। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में बना यह पुल आज भी उस दौर की मजबूत इंजीनियरिंग का उदाहरण माना जा रहा है। अब विक्रमशिला सेतु हादसे के बाद निर्माण गुणवत्ता, डिजाइन मानकों और निगरानी व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की मांग तेज हो गई है।

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