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शिक्षा या कारोबार: मधुबनी में प्राइवेट स्कूलों पर गंभीर सवाल, महंगी किताबें-फीस से अभिभावक बेहाल

मधुबनी, 22 अप्रैल (आशीष यादव) जिले में निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत तय मानकों के बावजूद कई प्राइवेट स्कूलों में नियमों की अनदेखी खुलेआम जारी है। हालात ऐसे बन गए हैं कि शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि एक महंगा कारोबार बनती नजर आ रही है, जिससे अभिभावकों की जेब पर भारी बोझ पड़ रहा है। सूत्रों के अनुसार, जिले के कई निजी स्कूल, जो Central Board of Secondary Education (CBSE) से संबद्ध हैं, कक्षा 9 तक अपने मनमाने प्रकाशनों की महंगी किताबें लागू कर रहे हैं।

इन किताबों की कीमत बाजार दर से काफी अधिक बताई जा रही है। इसके अलावा हर साल ट्यूशन फीस के साथ-साथ विभिन्न नामों पर अतिरिक्त शुल्क वसूला जा रहा है, जो अभिभावकों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बन गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि निजी स्कूलों में फीस लेना सामान्य बात है, लेकिन छोटे शहरों में जिस तरह से शिक्षा का व्यवसायीकरण बढ़ रहा है, वह चिंताजनक है। मधुबनी जैसे जिले में यह प्रवृत्ति तेजी से फैल रही है, जिससे सामाजिक संतुलन पर भी असर पड़ सकता है और यह एक बेहतर समाज के निर्माण में अवरोधक साबित हो रहा है।इतना ही नहीं, विद्यालय परिवहन अधिनियम 2020 के प्रावधानों का भी कई जगहों पर पालन नहीं हो रहा है। स्कूल बसों और परिवहन सुविधाओं में सुरक्षा मानकों की अनदेखी के आरोप सामने आ रहे हैं, जिससे छात्रों की सुरक्षा पर भी सवाल उठने लगे हैं।जिला प्रशासन ने इस मामले को संज्ञान में लिया है, लेकिन अब तक जमीनी स्तर पर कोई ठोस सुधार देखने को नहीं मिला है। अभिभावकों का कहना है कि शिकायतों के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।शिक्षाविदों का मानना है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो शिक्षा पूरी तरह व्यावसायिक ढांचे में बदल जाएगी। ऐसे में सभी चाहे वे विद्यालय संचालक हों या प्रशासन आगे आकर सकारात्मक माहौल में पहल करनी होगी, ताकि शिक्षा को व्यवसायिकरण से अलग कर एक बेहतर समाज के निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें।

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